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सुलगते यूरोप का मंजर: फ्रांस से अल्बानिया तक आगजनी-जनाक्रोश; किन-किन देशों में प्रदर्शन, क्यों बढ़ रहा गुस्सा?

Tue, 20 Oct 2026 01:08 AM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 20 Oct 2026 01:08 AM IST
सार

यूरोप के कई देशों में महंगाई, महंगे मकानों और सरकारी सेवाओं में कमी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं। फ्रांस, इटली और अल्बानिया में प्रदर्शन हिंसक हो गए, जबकि स्पेन और पुर्तगाल में लोग आवास की समस्या को लेकर विरोध कर रहे हैं। युवाओं के आक्रोश के बीच स्कूलों, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे भी आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं। आखिर यूरोप में बढ़ते असंतोष के पीछे कौन-कौन से कारण हैं? पढ़िए विस्तार से रिपोर्ट-

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From France to Albania, social unrest is setting Europe's streets ablaze
यूरोप में बवाल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी

विस्तार

ईंधन की बढ़ती कीमतें, स्कूलों की स्थिति को लेकर नाराजगी, सरकारी सेवाओं में कमी और आवास का संकट। इन सबने यूरोप में शरद ऋतु के दौरान विरोध प्रदर्शनों के लिए अनुकूल माहौल बना दिया है।
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कई हफ्तों से बड़े शहरों में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस, इटली और अल्बानिया में गिरफ्तारियां हुई हैं। लूटपाट, लोगों के घायल होने और हिंसा की घटनाएं भी सामने आई हैं। स्पेन और पुर्तगाल में बढ़ते किराये और घरों की महंगी कीमतों के विरोध में लोगों ने तंबू लगाकर डेरा डाल दिया है। उनका कहना है कि अब घर लेना उनकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
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इटली के बोलोन्या में मुख्य रेलवे स्टेशन के पास हिंसक झड़पें हुईं। फोटो : पीटीआई

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स्पेन के ड्यूस्टो विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर मारिया सिल्वेस्ट्रे ने कहा कि युवा सामाजिक व्यवस्था से निराश हैं। उन्हें भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता महसूस हो रही है। उन्हें लगता है कि हालात पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। उन्होंने कहा, जब कुछ खास परिस्थितियां एक साथ आती हैं, तो अचानक कोई ऐसी चिंगारी भड़क उठती है, जो लोगों की नाराजगी को दिशा देती है और उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित करती है। 

पेरिस के प्लास द ला रिपब्लिक चौक पर बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन करते हुए। फोटो : पीटीआई


कई शहर संघर्ष के मैदान में बदल गए हैं। यूरोपीय संघ की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस, इटली और स्पेन अहम चुनावों के करीब पहुंच रहे हैं। वहीं, जर्मनी में दक्षिणपंथी विचारधारा वाले दलों को चुनावों में सफलता मिली है। दूसरे देशों में भी उन्हें ऐसी सफलता मिल सकती है।

ये भी पढ़ें: केन्या में 191 हत्याओं के मामले में धर्मगुरु दोषी, अनुयायियों को भूखे रहकर जान देने का दिया था आदेश; कब होगी सजा?

यह विरोध ऐसे समय हो रहा है, जब यूक्रेन को समर्थन देने के मामले में यूरोप एक अहम दौर से गुजर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, रूस पर नाटो के सदस्य देशों में पहले से ज्यादा बार गुप्त और कई तरह के हमले करने के आरोप लग रहे हैं। इन गतिविधियों को हाइब्रिड हमले कहा जाता है।

 

ट्रंप ने किसको जिम्मेदार ठहराया?
दक्षिणपंथी नेताओं ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान फैली अव्यवस्था को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की है। फ्रांस में प्रदर्शन व्यापक जनसमर्थन वाले दिखाई दिए हैं। लेकिन ट्रंप ने तबाही के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोमवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, प्रवासियों ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है। उन्हें रोकने के लिए सीमाएं जल्द से जल्द बंद करनी होंगी!
 

पेरिस में विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्लास द ला रिपब्लिक चौक पर जलती हुई एक कार। फोटो : पीटीआई


नाराज युवाओं ने कई विरोध प्रदर्शनों को आगे बढ़ाया है। वहीं, काले कपड़े पहनने और चेहरे ढकने वाले कुछ उपद्रवियों ने हिंसा भड़काई है। हालांकि, फ्रांस के अधिकारियों और पुलिस ने इन घटनाओं के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया है।
 

यूरोप में विरोध प्रदर्शनों के पीछे की वजहों पर एक नजर- 

स्कूलों में संसाधन घट रहे हैं?
फ्रांस में आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों की सदियों पुरानी परंपरा रही है। यहां माध्यमिक विद्यालयों के छात्र तीन हफ्ते से ज्यादा समय से नाकेबंदी और प्रदर्शन कर रहे हैं। वे स्कूलों के लिए ज्यादा संसाधनों की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्कूलों में कर्मचारियों की कमी है और इमारतों की हालत खराब है। कम आय वाले इलाकों के स्कूलों में यह समस्या खास तौर पर गंभीर है।

बाद में इन प्रदर्शनों का दायरा बढ़ गया। फ्रांस के श्रमिक संघ सीजीटी और दूसरे कार्यकर्ता भी इसमें शामिल हो गए। उस समय छात्रों की शरद ऋतु की छुट्टियां चल रही थीं। अब इस आंदोलन में बढ़ती महंगाई और सरकारी सेवाओं से जुड़ी मांगें भी शामिल हो गई हैं।

पेरिस में झड़प के दौरान सड़क पर जल रहे मलबे को पानी से बुझाने की कोशिश करता एक व्यक्ति। फोटो: पीटीआई


सैकड़ों-हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरे। इसके बावजूद सप्ताहांत में कई जगह हिंसा और अशांति हुई। फ्रांस के अलग-अलग हिस्सों में 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पेरिस, मार्सेई, लियोन और बोर्डो में लूटपाट की घटनाएं हुईं।

लीमोज में 19वीं सदी के सिटी हॉल में आग की लपटें फैल गईं। इमारत लगभग पूरी तरह तबाह होने वाली थी। कुछ स्कूलों में भी आग लगा दी गई। छात्रों और उपद्रवियों ने पेट्रोल बम फेंके। इसके जवाब में कानून लागू कराने वाली एजेंसियों ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इन घटनाओं में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।

राष्ट्रपति मैक्रों ने क्या चेतावनी दी?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शनिवार को हुई हिंसा की निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि अति-वामपंथी कार्यकर्ता इमारतों और पुलिस पर हमला करके अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। मैक्रों ने रविवार को टेलीविजन पर दिए गए अपने संबोधन में कहा, जिन लोगों ने लूटपाट की है, उन्हें नुकसान की भरपाई करनी होगी। गणराज्य को गिराने की कोशिश करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।



स्पेन में शिक्षकों ने क्यों शुरू की अनिश्चतकालीन हड़ताल?
स्पेन में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने पिछले सप्ताह मैड्रिड में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की। वे बेहतर वेतन और काम करने की अच्छी परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं। इस साल स्पेन के दूसरे इलाकों में भी नाराज शिक्षकों ने इसी तरह काम बंद किया था।

महंगे घरों के कारण बढ़ीं युवाओं की मुश्किलें?
मैड्रिड के बीचोंबीच स्थित पुएर्ता डेल सोल चौक में कई हफ्तों से तिरपाल वाले तंबू लगे हुए हैं। लोग बढ़ती आवास लागत के विरोध में यहां डेरा डाले हुए हैं। 87 वर्षीय मारिकारमेन को उनके घर से निकाले जाने के बाद इस विरोध की शुरुआत हुई थी। बाद में अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद स्पेन के दूसरे शहरों में भी छोटे विरोध शिविर लगाए गए।

तंबू लगाए जाने के बाद कुछ बदलाव हुए हैं। जनता के दबाव में सत्तारूढ़ समाजवादी सरकार ने किफायती आवास से जुड़े उपायों को मंजूरी दी। लेकिन संसद में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण ये उपाय पारित नहीं हो सके। इसके बाद प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने नवंबर में समय से पहले चुनाव कराने का एलान किया। नवंबर में आम हड़ताल भी होगी। यह 14 साल में पहली ऐसी हड़ताल होगी।

अल्बानिया की राजधानी तिराना में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में क्षतिग्रस्त हुई एक सार्वजनिक इमारत। फोटो: पीटीआई


आवास और वेतन को लेकर बड़े प्रदर्शन
स्पेन के बार्सिलोना में भी आवास को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए हैं। यह शहर जरूरत से ज्यादा पर्यटकों के आने और आवास की समस्या के लिए प्रमुख केंद्र बन गया है। स्पेन में न्यूनतम मासिक वेतन 1,221 यूरो (1,370 अमेरिकी डॉलर) है। वहीं, 80 वर्ग मीटर के एक अपार्टमेंट का औसत मासिक किराया करीब 1,130 यूरो (लगभग 1,270 अमेरिकी डॉलर) है। कारोबारी अखबार एक्सपानसियोन के एक विश्लेषण में यह जानकारी दी गई है। 

मैड्रिड के धरने में बैठे लोगों में शामिल 20 वर्षीय वेट्रेस डायना मनसानारेस ने कहा, मेरी तनख्वाह का ज्यादातर हिस्सा किराये में चला जाता है। मेरे साथ रहने वाले व्यक्ति को भी गुजारा करने में मेरी तरह ही परेशानी होती है। यही मेरी जिंदगी की हकीकत है। इस शहर में रहने वाले हममें से ज्यादातर लोगों की भी यही स्थिति है।




पुर्तगाल में क्यों हो रहे विरोध प्रदर्शन?
पुर्तगाल के सबसे बड़े शहरों लिस्बन और पोर्टो में भी आवास को लेकर इसी तरह के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

इटली में प्रदर्शनकारी क्या मांग कर रहे?
'इतालिया इन पियात्सा' यानी 'सड़कों पर इटली' नाम के आंदोलन ने हजारों प्रदर्शनकारियों को एकजुट किया है। वे रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आवास तक पहुंच बेहतर बनाने की मांग कर रहे हैं। बढ़ती लागत से निपटने के लिए वे ज्यादा वेतन भी चाहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इटली में सितंबर में महंगाई दर बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई। यह यूरो क्षेत्र की 3.8 प्रतिशत महंगाई दर से ज्यादा है।

इटली के मिलान में हिंसक विरोध प्रदर्शन। फोटो: पीटीआई


शांतिपूर्ण मार्च के दौरान उत्तरी इटली के तीन शहरों में हिंसा भड़क उठी। इनमें ट्यूरिन और बोलोन्या के साथ मिलान भी शामिल है। मिलान इटली की वित्तीय और फैशन राजधानी है। यहां उपद्रवियों की पुलिस से झड़प हुई। दुकानों में लूटपाट की गई और संपत्तियों में आग लगा दी गई। पुलिस के अनुसार, मिलान में दो दिन तक चली अशांति के दौरान 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें ज्यादातर नाबालिग थे। बताया गया कि सुरक्षा बलों के 14 सदस्य घायल हुए।

अब खुद को '17 अक्टूबर आंदोलन' कहने वाले एक नए समूह ने लगातार विरोध प्रदर्शन करने का एलान किया है। समूह ने इसे 'स्थायी आंदोलन' बताया है। उसने समर्थकों से इटली के अलग-अलग शहरों में हर शनिवार दोपहर तीन बजे प्रदर्शन करने की अपील की है। इसकी शुरुआत मिलान से होगी।

सुरक्षा उपकरणों और ढालों के साथ सड़क पर खड़े  इटली की दंगा-रोधी पुलिस के जवान। फोटो: पीटीआई


अल्बानिया में छठे दिन भी विरोध प्रदर्शन
अल्बानिया की राजधानी तिराना में रविवार को सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार छठे दिन भी जारी रहे। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच फिर झड़पें हुईं। माध्यमिक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्र भी व्यापक सरकार विरोधी 'फ्लेमिंगो' आंदोलन में शामिल हो गए। इसके बाद हिंसा और बढ़ गई। प्रदर्शनकारी समाजवादी प्रधानमंत्री एदि रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

अल्बानिया की राजधानी तिराना में शिक्षा मंत्रालय के पास बैरिकेड में आग लगाते प्रदर्शनकारी। फोटो: पीटीआई


रामा ने प्रदर्शनों की निंदा की है। उनका कहना है कि एंटीफा ने प्रदर्शनकारियों को 'वैचारिक रूप से प्रभावित किया और कट्टरपंथी बना दिया है। एंटीफा अमेरिका में आम तौर पर संगठित अति-वामपंथी उग्रवादियों के समूहों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक व्यापक शब्द है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एंटीफा को आतंकवादी संगठन घोषित किया है।

अल्बानिया के आंदोलन की प्रमुख मांग भ्रष्टाचार खत्म करना है। इस आंदोलन का नाम 'फ्लेमिंगो' उस इलाके में पाए जाने वाले पक्षियों के नाम पर रखा गया है। इसी इलाके में रामा सरकार ने बड़े स्तर पर लग्जरी पर्यटन परियोजना को मंजूरी देने पर सहमति जताई थी। इस परियोजना का संबंध ट्रंप के दामाद जरेड कुशनर से है। आंदोलन से जुड़े लोग स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सरकारी पेंशन की सुरक्षा भी चाहते हैं। इसकी जानकारी आंदोलन की वेबसाइट पर दी गई है।

अल्बानिया की राजधानी तिराना में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पानी की बौछार करने वाले वाहन के पीछे बचाव करते दंगा-रोधी पुलिसकर्मी। फोटो : पीटीआई


सर्बिया में क्या स्थिति है?
सर्बिया में विश्वविद्यालय के छात्र करीब दो साल से बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे हैं। अब वे इस महीने होने वाले संसदीय चुनाव में बाल्कन देश के ताकतवर लोकलुभावन नेता अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं।

पूर्व सत्तावादी राष्ट्रपति वुसिक 25 अक्तूबर के मतदान के बाद फिर प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं। माना जा रहा है कि युवाओं के समर्थन वाली 'स्टूडेंट्स लिस्ट' पार्टी, वुसिक की पार्टी को कड़ी टक्कर दे रही है। इसलिए चुनाव के नतीजों पर अनिश्चितता बनी हुई है। इससे संभावित हिंसा को लेकर आशंकाएं भी बढ़ रही हैं।
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