विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला इस वर्ष 11 सितंबर 2026 को जाम नदी के किनारे आयोजित होगा। पांढुर्णा और सावरगांव के ग्रामीणों के बीच होने वाली पत्थरबाजी की इस पुरानी परंपरा को लेकर प्रशासन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। मेले के दौरान दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं, जिसमें हर साल कई लोग घायल हो जाते हैं।
पांढुर्णा कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ ने शांति समिति की बैठक में कहा कि मेले में गोफन के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। आयोजन के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती के साथ स्वास्थ्य विभाग की टीम, एंबुलेंस और प्राथमिक उपचार की पर्याप्त व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि सूर्यास्त से पहले नदी के बीच लगाए जाने वाले झंडे को तोड़ दिया जाए, क्योंकि झंडा टूटने के साथ ही गोटमार का खेल समाप्त माना जाता है।
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प्रेम कहानी से जुड़ी है गोटमार की प्रचलित कथा
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर कोई प्रमाणित जानकारी उपलब्ध नहीं है, हालांकि इसके पीछे एक प्रेम कहानी से जुड़ी प्रचलित कथा बताई जाती है। कहा जाता है कि वर्षों पहले पांढुर्णा का एक युवक सावरगांव की युवती को प्रेम प्रसंग के चलते अपने साथ ले गया था। दोनों जब जाम नदी के पास पहुंचे तो दोनों परिवारों के लोगों ने उन पर पत्थरों से हमला कर दिया। इस घटना में दोनों की नदी के बीच मौत हो गई। इसके बाद से दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंककर गोटमार मेला मनाने लगे। वर्षों पुरानी इस परंपरा में अब तक 18 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इसके बावजूद पांढुर्णा में हर साल गोटमार मेले का आयोजन जारी है।
पलाश के पेड़ को गांव की बेटी मानते हैं सावरगांव के लोग
मेले की परंपरा कितनी पुरानी है, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है। जाम नदी में मां चंडी की पूजा के बाद सावरगांव पक्ष के लोग नदी के बीच पलाश का एक पेड़ लगाकर उस पर झंडा बांधते हैं। सावरगांव के ग्रामीण इस पलाश के पेड़ को अपने गांव की बेटी का प्रतीक मानते हैं।
इसके बाद पांढुर्णा और सावरगांव के लोग नदी के दोनों किनारों से एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस दौरान दोनों पक्षों में से जो पक्ष पलाश के पेड़ को उखाड़कर अपने कब्जे में कर लेता है, उसे विजेता माना जाता है। इसके बाद दोनों गांवों के लोग मिलकर पलाश के पेड़ को मां चंडी के मंदिर ले जाते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।