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वत्स द्वादशी आज, इस दिन गौ सेवा करने से मिलता है सुख और पूर्ण होती हैं मनोकामनाएं

Tue, 08 Sep 2026 01:50 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 08 Sep 2026 01:50 PM IST
सार

हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के द्वादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गो वत्स द्वादशी का व्रत माताएं अपनी संतान की मंगलकामना के लिए रखती हैं। इस तिथि पर गाय और उनके बछड़े की पूजा करने का विधान होता है। 

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govatsa dwadashi 2026 date time importance significance vrat katha in hindi
govatsa dwadashi 2026 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हर मां अपने बच्चों की रक्षा, प्रसन्नता और उन्नति चाहती है। ऐसी ही माताओं का त्योहार है वत्स द्वादशी। गौ माता को समर्पित यह पर्व भाद्र मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कहीं-कहीं इसे बछ बारस भी कहा जाता है। इस दिन बछड़े वाली गाय की पूजा के साथ गौ रक्षा का संकल्प लिया जाता है। गौ सेवा, श्रद्धा और मातृत्व भाव से जुड़ा यह पर्व हमारी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष महत्व रखता है।

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वत्स द्वादशी पर गौ माता की पूजा का विधान
वत्स द्वादशी के दिन बछड़े वाली गाय की पूजा करने की परंपरा है। इस अवसर पर गौ माता को हरा चारा, अंकुरित मूंग, मोठ, चने, मीठी रोटी और गुड़ आदि श्रद्धापूर्वक खिलाया जाता है। गाय की पूजा करने के बाद उसे स्पर्श करते हुए क्षमा याचना की जाती है और उसकी परिक्रमा की जाती है। यदि घर के आस-पास गाय और बछड़ा उपलब्ध न हों तो शुद्ध गीली मिट्टी से गाय-बछड़े की आकृति बनाकर उनकी पूजा करने का भी विधान है। इस दिन महिलाओं द्वारा चाकू से काटकर बनाई गई वस्तु न बनाने और न खाने की भी परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है।
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बछ बारस से जुड़ी पौराणिक मान्यता
बछ बारस शुरू होने के पीछे एक पौराणिक मान्यता भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने इसी दिन गौ माता के दर्शन और उनका पूजन किया था। इसी कारण वत्स द्वादशी का पर्व विशेष रूप से गौ माता और बछड़े के प्रति श्रद्धा एवं वात्सल्य का प्रतीक माना जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से व्रती जीवन में सभी सुखों को भोगते हुए अंत में गौ के जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक गोलोक में वास करता है। इसलिए इस दिन गौ सेवा और पूजा को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
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गौ सेवा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
गाय की पूजा के पीछे धार्मिक मान्यता है कि गौ माता के रोम-रोम में देवी-देवताओं और तीर्थों का वास है। सभी वेद भी गाय में प्रतिष्ठित माने गए हैं। इसलिए शास्त्रों के अनुसार समस्त देवी-देवताओं और पितरों को प्रसन्न करना हो तो गौ सेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। मान्यता है कि गौ माता को श्रद्धापूर्वक भोजन कराने से उसका पुण्य सभी देवी-देवताओं तक स्वतः पहुंच जाता है। गाय के गोबर में लक्ष्मीजी का वास माना गया है। इसी कारण गोबर से बने उपलों से हवन कुंड की अग्नि प्रज्वलित करने की परंपरा रही है। गौमूत्र में गंगा मैया का वास माना जाता है और धार्मिक परंपराओं में इसे पवित्र माना गया है।


गाय के दूध, घी और गोबर का महत्व
गाय का दूध और घी हमारे पारंपरिक आहार में उत्तम माने गए हैं। धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों में भी गाय के घी का विशेष महत्व है। नवग्रहों के साथ-साथ वरुण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी जाने वाली आहुति में गाय के घी के प्रयोग की परंपरा रही है।गाय के गोबर से बने उपलों का उपयोग हवन और धार्मिक कार्यों में किया जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार इससे उत्पन्न धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। इसी तरह गौमूत्र को भी आयुर्वेदिक परंपरा में उपयोगी माना गया है। हालांकि किसी रोग के उपचार के लिए इसका सेवन चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।

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