एमपी: 10 सितंबर को निकलेगी देवी अहिल्या की प्रेरणा पालकी यात्रा, राजपरिवार समेत नगरवासी होंगे शामिल
महेश्वर में 10 सितंबर को देवी अहिल्या की प्रेरणा पालकी यात्रा निकलेगी। इसमें होलकर राजपरिवार, शैक्षणिक संस्थान, व्यापारी संघ, सामाजिक संगठन और नगरवासी शामिल होंगे। यात्रा के जरिए लोकमाता की विरासत, लोककल्याणकारी कार्यों और महेश्वर की ऐतिहासिक पहचान को याद किया जाएगा।
विस्तार
नर्मदा के पवित्र तट पर बसा महेश्वर केवल ऐतिहासिक नगर ही नहीं, बल्कि पुण्यश्लोका लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की कर्मभूमि और जीवंत विरासत है। उन्होंने अठारहवीं सदी में महेश्वर को होलकर रियासत की राजधानी बनाकर धर्म, संस्कृति, व्यापार, ज्ञान और रोजगार का प्रमुख केंद्र बनाया। उनकी स्मृति आज भी महेश्वर के जनजीवन में जीवित है।
लोकमाता की 231वीं पुण्यतिथि के अवसर पर अहिल्या उत्सव समिति की ओर से विभिन्न आयोजन किए जा रहे हैं। इसी क्रम में 10 सितंबर को सुबह 8:30 बजे देवीश्री बस स्टैंड से देवी अहिल्या की प्रेरणा पालकी यात्रा निकाली जाएगी।
पालकी यात्रा में होलकर राजपरिवार के सदस्यों के साथ महेश्वर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, व्यापारी संघों, सामाजिक संगठनों और नगरवासियों की सहभागिता रहेगी। यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत का सार्वजनिक स्मरण भी होगी, जिसने महेश्वर को एक छोटे से नगर से होलकर राजधानी के रूप में स्थापित किया।
देवी अहिल्या ने महेश्वर को राजधानी बनाने के बाद विकास की ऐसी आधारशिला रखी, जिसमें शासन के साथ लोककल्याण को भी प्राथमिकता दी गई। सरकारवाड़ा, घाट, मंदिर, बाजार, ब्रह्मपुरी, हाथकरघा और व्यापारिक पेठें उनके दूरदर्शी प्रशासन की गवाही देती हैं। उन्होंने बुनकरों को महेश्वर में बसाकर हाथकरघा परंपरा को प्रोत्साहित किया। यही परंपरा आगे चलकर महेश्वरी साड़ी के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुई। देश के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वानों को आमंत्रित कर स्थापित की गई ब्रह्मपुरी ने महेश्वर को धार्मिक और ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान दिलाई।
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अनेक शिव मंदिरों का निर्माण कराया
देवी अहिल्या की धार्मिक दृष्टि भी व्यापक थी। महेश्वर में काशी विश्वेश्वर, मतंगेश्वर, बाणेश्वर, रावणेश्वर, राजेश्वर और कालेश्वर सहित अनेक शिव मंदिरों का निर्माण कराया गया। इसके साथ ही राम, कृष्ण, विट्ठल, भवानी, महालक्ष्मी सहित अन्य देवी-देवताओं के मंदिरों की स्थापना और पूजा व्यवस्था भी की गई। इससे महेश्वर की पहचान सत्ता की राजधानी के साथ आस्था और संस्कृति के केंद्र के रूप में भी बनी।
नर्मदा तट पर हुआ था अंतिम संस्कार
13 अगस्त 1795 को अहिल्यादेवी का निधन हुआ था। नर्मदा तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन के बाद भी उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने का सिलसिला जारी रहा। अहिल्या घाट, किले की भव्य छतरी और स्मारक मंदिर आज भी उनके युग की अमिट निशानियां हैं। बाद के होलकर शासकों द्वारा निर्मित इन स्मारकों ने महेश्वर की धरती पर अहिल्यादेवी की स्मृति को स्थायी रूप दिया।
