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वीरेन्द्र खरे अकेला: लोग भी क्या हैं किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए

उर्दू अदब
                
                                                         
                            लोग भी क्या हैं किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए
                                                                 
                            
फूल पर बैठी हुई तितली उड़ा कर ख़ुश हुए

प्यास हम अपनी बुझा लें ये इजाज़त है कहाँ
फिर भी ऐ दरिया तिरे नज़दीक आकर ख़ुश हुए

मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं
लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपा कर ख़ुश हुए

शक्ल-ओ-सूरत देखने लाइक़ थी तब सय्याद की
क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ा कर ख़ुश हुए

आख़िरश करते भी क्या जब क्लास में टीचर न था
सारे बच्चा बच्चियाँ ऊधम मचा कर ख़ुश हुए

बोझ दिल का एक ही झटके में हल्क़ा हो गया
हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुला कर ख़ुश हुए

ऐ 'अकेला' और क्या होना था बस इतना हुआ
सर-फिरे झोंके चराग़ों को बुझा कर ख़ुश हुए

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7 घंटे पहले

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