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सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट विवाद: विशेष अदालत ने लोकायुक्त पुलिस से मांगी रिपोर्ट, खरगे परिवार से जुड़ी है शिकायत
Fri, 18 Sep 2026 10:53 PM IST
अमन तिवारी
पीटीआई, बंगलूरू
पीटीआई, बंगलूरू
Published by: अमन तिवारी
Updated Fri, 18 Sep 2026 10:53 PM IST
सार
मल्लिकार्जुन खरगे और उनके परिवार से जुड़े सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट के खिलाफ जमीन आवंटन से जुड़ी शिकायत पर कर्नाटक की विशेष अदालत ने लोकायुक्त पुलिस से जवाब मांगा है। शिकायत में बीडीए भूखंड के आवंटन और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई है। मामले में अगली सुनवाई छह अक्टूबर को होगी।
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मल्लिकार्जुन खरगे
- फोटो : ani
विस्तार
कर्नाटक में सांसद-विधायकों की विशेष अदालत ने शुक्रवार को लोकायुक्त पुलिस को एक अहम निर्देश दिया है। अदालत ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और उनके परिवार से जुड़े 'सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट' के मामले में लोकायुक्त पुलिस को अपना पक्ष और रिपोर्ट पेश करने को कहा है। यह मामला पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ी एक निजी शिकायत से संबंधित है। इस ट्रस्ट में राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे, उनके बेटे व कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे और अन्य परिजन ट्रस्टी हैं। यह शिकायत 'लंचमुक्त कर्नाटक वेदिके' के अध्यक्ष विजयराघव मराठे ने दर्ज कराई है।
अपर नगर दीवानी एवं सत्र अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने हलफनामे की तकनीकी गलती को सुधार लिया है। अब इस मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं है। इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को बीएनएसएस की धारा 223 के तहत जांच के निर्देश को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने हलफनामे की कमी को ठीक करने का अवसर देते हुए मामले को धारा 175 के तहत चलाने का आदेश दिया था।
शिकायतकर्ता ने 10 सितंबर को नया हलफनामा और हाईकोर्ट के आदेश की प्रति अदालत में पेश की। विशेष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि उसने 11 अगस्त के अपने आदेश में प्रथम दृष्टया अनियमितताओं की बात पाई थी। अदालत ने लोकायुक्त एसपी को नोटिस जारी कर 6 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी।
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यह मामला बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) की ओर से सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को नागरिक सुविधा (सीए) भूखंड के आवंटन में बड़े पैमाने पर हुई धांधली के आरोपों से जुड़ा है। शिकायत में बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत जांच की मांग की गई है। अदालत के आदेश के मुताबिक, इस ट्रस्ट की स्थापना 1994 में हुई थी और मल्लिकार्जुन खरगे इसके शुरुआती पांच ट्रस्टियों में शामिल थे। इसके बाद साल 2010 में बने पूरक ट्रस्ट डीड के तहत उनकी पत्नी राधाबाई एम. खरगे और दो बेटों- राहुल खरगे व प्रियांक खरगे को ट्रस्टी बनाया गया था।
शिकायत में आरोप है कि ट्रस्ट का उद्देश्य किसी भी जाति या धर्म से परे आम जनता की सेवा करना था। इसके बावजूद ट्रस्ट ने बीडीए के भूखंड के लिए अनुसूचित जाति (एससी) कोटे के तहत आवेदन किया। आरोप है कि राजनीतिक रसूख और बीडीए अधिकारियों की मिलीभगत से लीज की रकम में 50 प्रतिशत की छूट ली गई। बाद में इसी मिलीभगत के चलते एक वैकल्पिक जमीन भी हासिल कर ली गई।
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अपर नगर दीवानी एवं सत्र अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने हलफनामे की तकनीकी गलती को सुधार लिया है। अब इस मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं है। इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को बीएनएसएस की धारा 223 के तहत जांच के निर्देश को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने हलफनामे की कमी को ठीक करने का अवसर देते हुए मामले को धारा 175 के तहत चलाने का आदेश दिया था।
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शिकायतकर्ता ने 10 सितंबर को नया हलफनामा और हाईकोर्ट के आदेश की प्रति अदालत में पेश की। विशेष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि उसने 11 अगस्त के अपने आदेश में प्रथम दृष्टया अनियमितताओं की बात पाई थी। अदालत ने लोकायुक्त एसपी को नोटिस जारी कर 6 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी।
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यह मामला बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) की ओर से सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को नागरिक सुविधा (सीए) भूखंड के आवंटन में बड़े पैमाने पर हुई धांधली के आरोपों से जुड़ा है। शिकायत में बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत जांच की मांग की गई है। अदालत के आदेश के मुताबिक, इस ट्रस्ट की स्थापना 1994 में हुई थी और मल्लिकार्जुन खरगे इसके शुरुआती पांच ट्रस्टियों में शामिल थे। इसके बाद साल 2010 में बने पूरक ट्रस्ट डीड के तहत उनकी पत्नी राधाबाई एम. खरगे और दो बेटों- राहुल खरगे व प्रियांक खरगे को ट्रस्टी बनाया गया था।
शिकायत में आरोप है कि ट्रस्ट का उद्देश्य किसी भी जाति या धर्म से परे आम जनता की सेवा करना था। इसके बावजूद ट्रस्ट ने बीडीए के भूखंड के लिए अनुसूचित जाति (एससी) कोटे के तहत आवेदन किया। आरोप है कि राजनीतिक रसूख और बीडीए अधिकारियों की मिलीभगत से लीज की रकम में 50 प्रतिशत की छूट ली गई। बाद में इसी मिलीभगत के चलते एक वैकल्पिक जमीन भी हासिल कर ली गई।