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Delhi NCR News: अलविदा जंतर मंतर... बदल गया राजधानी में प्रदर्शन का पता
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रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड में जुटेंगे प्रदर्शनकारी, आठ साल बाद फिर बदला दिल्ली में धरना-प्रदर्शन का ठिकाना
संतोष कुमार
नई दिल्ली। दिल्ली की पहचान सिर्फ सत्ता के गलियारों, ऐतिहासिक इमारतों और सियासी हलचलों से नहीं बनी। इसकी सड़कों ने उन नारों को भी सुना है, जिन्होंने देशभर के आंदोलनों को आवाज दी। कभी संसद के दरवाजे पर दस्तक, कभी बोट क्लब पर किसानों का शक्ति प्रदर्शन, तो कभी जंतर-मंतर पर दिन-रात धरना। दिल्ली में विरोध की जगहें बदलती रहीं, लेकिन अपनी मांग सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश जारी रही।
इस क्रम में सोमवार बड़ा मोड़ आया। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है। यह बदलाव सिर्फ जगह बदलने की कहानी नहीं है। जंतर-मंतर, जिसने देशभर से आये प्रदर्शनकारियों के लंबे और कई बार दिलचस्प तरीके से होने वाले धरने को देखा है, वहां आठ साल बाद एक बार फिर से वहां शांति होगी...न कोई नारा...न कोई धरना और न कोई मांगों की फेहरिस्त से सजे पोस्टर और तख्तियां। इसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड में धरने जमेंगे।
अक्तूबर 2017 में भी लगी दिल्ली थी बंदिश
एनजीटी के आदेश पर अक्तूबर 2017 में जंतर मंतर पर प्रदर्शनों की बंदिश लग गई थी। सिविल सोसाइटी ने इसका उस वक्त विरोध किया था। इसकी फरियाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और अगले साल जुलाई 2018 में बंदिश हटा ली गई थी। हालांकि, इजाजत नियमों के अधीन मिलनी थी।
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वोट क्लब से जंतर मंतर
. देश की आजादी के लिए लोगों को एकजुट करने के लिए व्यवसायियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने चांदनी चौक के आजाद पार्क, दरियागंज के पटौदी हाउस, टाउन हॉल क्लॉक टावर, फिरोज शाह कोटला, कश्मीरी गेट और जामा मस्जिद पर विरोध प्रदर्शन किए। आजादी के बाद सत्ता के गलियारे पर नजर रखने के लिए आंदोलन की सबसे मुफीद जगह संसद को चुना। 1966 तक यह सिलसिला चला। इसके बाद गो रक्षा की मांग को लेकर धरने ने हिंसक रूप ले लिया और आम जनता के यहां प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। 1966-1980 के बीच रामलीला मैदान प्रदर्शनकारियों की सबसे पसंदीदा जगह बन गई, जबकि छोटे प्रदर्शन राजपथ के बोट क्लब का रुख करने लगे। 1980 के दौर में बोट क्लब सबसे पसंदीदा धरना स्पॉट बन चुका था। लेकिन एक प्रदर्शन के दौरान किसानों का बेहद उग्र रूप देखने को मिला। बड़ी संख्या में किसानों ने बैलगाड़ियों के साथ इंडिया गेट के लॉन पर एक हफ्ते तक कब्जा कर लिया था।. इसके बाद बोट क्लब पर बैन लगा। फिर, लाल किला और कभी-कभार बुराड़ी में प्रदर्शन होने लगे। 1993 के बाद जंतर-मंतर एक नए अड्डे के तौर पर अस्तित्व में आया जहां कई बड़े प्रदर्शन हुए।
तीन नई जगहें और चुनौतियां
1. रामलीला मैदान : बड़े आंदोलनों का पुराना ठिकाना
50 हजार लोगों के जुटान की क्षमता
-बुकिंग के नियमों और इसमें बदलाव करने का अधिकार एमसीडी सदन के पास है।
-कमला मार्केट, दिल्ली गेट समेत रामलीला मैदान में प्रदर्शन के दौरान आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होती है। इसका असर कनॉट प्लेस तक दिखता है।
-दिल्ली मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन और बसों से कनेक्टिविटी बेहतर है।
-जंतर मंतर से इसकी दूरी चार किलोमीटर है।
-- -
2. सीबीडी ग्राउंड-पूर्वी दिल्ली का नया विकल्प
50 हजार लोगों के जुटान की क्षमता
-कड़कड़डूमा कोर्ट के नजदीक सीबीडी ग्राउंड डीडीए के अधीन है।
-दिल्ली मेट्रो के कड़कड़डूमा कोर्ट स्टेशन के साथ बसों से कनेक्टिविटी है। मेट्रो, बस, पार्किंग और पैदल पहुंचने की सुविधा है।
-चारों तरफ से खुला होने की वजह से पुलिस को सुरक्षा बंदोबस्त में अतिरिक्त इंतजाम करने होंगे।
-सीबीडी ग्राउंड जंतर मंतर से 12 से 13 किलोमीटर दूर है।
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3. बुराड़ी ग्राउंड- बड़े जुटान की बड़ी जगह
एक लाख लोगों के जुटान की क्षमता
-पिंक लाइन का मेट्रो स्टेशन और आउटर रिंग से चलने वाली बसों से पहुंच आसान होगी।
-बुराड़ी ग्राउंड डीडीए के अधीन आता है।
-जंतर मंतर से बुराड़ी मैदान करीब 21 किलोमीटर दूर है।
-चारों तरफ से खुला होने की वजह से पुलिस को सुरक्षा बंदोबस्त में अतिरिक्त इंतजाम करने होंगे।
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1724 में बनाया गया जंतर मंतर
जंतर-मंतर 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इससे ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की गति और समय की सटीक गणना की जाती थी। इसका नाम संस्कृत के यंत्र और मंत्र शब्दों से मिलकर बना है। जंतर-मंतर 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इससे ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की गति और समय की सटीक गणना की जाती थी। इसका नाम संस्कृत के यंत्र और मंत्र शब्दों से मिलकर बना है।
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संतोष कुमार
नई दिल्ली। दिल्ली की पहचान सिर्फ सत्ता के गलियारों, ऐतिहासिक इमारतों और सियासी हलचलों से नहीं बनी। इसकी सड़कों ने उन नारों को भी सुना है, जिन्होंने देशभर के आंदोलनों को आवाज दी। कभी संसद के दरवाजे पर दस्तक, कभी बोट क्लब पर किसानों का शक्ति प्रदर्शन, तो कभी जंतर-मंतर पर दिन-रात धरना। दिल्ली में विरोध की जगहें बदलती रहीं, लेकिन अपनी मांग सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश जारी रही।
इस क्रम में सोमवार बड़ा मोड़ आया। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है। यह बदलाव सिर्फ जगह बदलने की कहानी नहीं है। जंतर-मंतर, जिसने देशभर से आये प्रदर्शनकारियों के लंबे और कई बार दिलचस्प तरीके से होने वाले धरने को देखा है, वहां आठ साल बाद एक बार फिर से वहां शांति होगी...न कोई नारा...न कोई धरना और न कोई मांगों की फेहरिस्त से सजे पोस्टर और तख्तियां। इसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड में धरने जमेंगे।
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अक्तूबर 2017 में भी लगी दिल्ली थी बंदिश
एनजीटी के आदेश पर अक्तूबर 2017 में जंतर मंतर पर प्रदर्शनों की बंदिश लग गई थी। सिविल सोसाइटी ने इसका उस वक्त विरोध किया था। इसकी फरियाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और अगले साल जुलाई 2018 में बंदिश हटा ली गई थी। हालांकि, इजाजत नियमों के अधीन मिलनी थी।
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वोट क्लब से जंतर मंतर
. देश की आजादी के लिए लोगों को एकजुट करने के लिए व्यवसायियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने चांदनी चौक के आजाद पार्क, दरियागंज के पटौदी हाउस, टाउन हॉल क्लॉक टावर, फिरोज शाह कोटला, कश्मीरी गेट और जामा मस्जिद पर विरोध प्रदर्शन किए। आजादी के बाद सत्ता के गलियारे पर नजर रखने के लिए आंदोलन की सबसे मुफीद जगह संसद को चुना। 1966 तक यह सिलसिला चला। इसके बाद गो रक्षा की मांग को लेकर धरने ने हिंसक रूप ले लिया और आम जनता के यहां प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। 1966-1980 के बीच रामलीला मैदान प्रदर्शनकारियों की सबसे पसंदीदा जगह बन गई, जबकि छोटे प्रदर्शन राजपथ के बोट क्लब का रुख करने लगे। 1980 के दौर में बोट क्लब सबसे पसंदीदा धरना स्पॉट बन चुका था। लेकिन एक प्रदर्शन के दौरान किसानों का बेहद उग्र रूप देखने को मिला। बड़ी संख्या में किसानों ने बैलगाड़ियों के साथ इंडिया गेट के लॉन पर एक हफ्ते तक कब्जा कर लिया था।. इसके बाद बोट क्लब पर बैन लगा। फिर, लाल किला और कभी-कभार बुराड़ी में प्रदर्शन होने लगे। 1993 के बाद जंतर-मंतर एक नए अड्डे के तौर पर अस्तित्व में आया जहां कई बड़े प्रदर्शन हुए।
तीन नई जगहें और चुनौतियां
1. रामलीला मैदान : बड़े आंदोलनों का पुराना ठिकाना
50 हजार लोगों के जुटान की क्षमता
-बुकिंग के नियमों और इसमें बदलाव करने का अधिकार एमसीडी सदन के पास है।
-कमला मार्केट, दिल्ली गेट समेत रामलीला मैदान में प्रदर्शन के दौरान आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होती है। इसका असर कनॉट प्लेस तक दिखता है।
-दिल्ली मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन और बसों से कनेक्टिविटी बेहतर है।
-जंतर मंतर से इसकी दूरी चार किलोमीटर है।
2. सीबीडी ग्राउंड-पूर्वी दिल्ली का नया विकल्प
50 हजार लोगों के जुटान की क्षमता
-कड़कड़डूमा कोर्ट के नजदीक सीबीडी ग्राउंड डीडीए के अधीन है।
-दिल्ली मेट्रो के कड़कड़डूमा कोर्ट स्टेशन के साथ बसों से कनेक्टिविटी है। मेट्रो, बस, पार्किंग और पैदल पहुंचने की सुविधा है।
-चारों तरफ से खुला होने की वजह से पुलिस को सुरक्षा बंदोबस्त में अतिरिक्त इंतजाम करने होंगे।
-सीबीडी ग्राउंड जंतर मंतर से 12 से 13 किलोमीटर दूर है।
3. बुराड़ी ग्राउंड- बड़े जुटान की बड़ी जगह
एक लाख लोगों के जुटान की क्षमता
-पिंक लाइन का मेट्रो स्टेशन और आउटर रिंग से चलने वाली बसों से पहुंच आसान होगी।
-बुराड़ी ग्राउंड डीडीए के अधीन आता है।
-जंतर मंतर से बुराड़ी मैदान करीब 21 किलोमीटर दूर है।
-चारों तरफ से खुला होने की वजह से पुलिस को सुरक्षा बंदोबस्त में अतिरिक्त इंतजाम करने होंगे।
1724 में बनाया गया जंतर मंतर
जंतर-मंतर 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इससे ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की गति और समय की सटीक गणना की जाती थी। इसका नाम संस्कृत के यंत्र और मंत्र शब्दों से मिलकर बना है। जंतर-मंतर 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इससे ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की गति और समय की सटीक गणना की जाती थी। इसका नाम संस्कृत के यंत्र और मंत्र शब्दों से मिलकर बना है।