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पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ पर दो नजरिये: सत्ता की नजर में ‘गंभीर चुनौती’, विपक्ष के लिए ‘उपहास’ का ‘मुद्दा’

Mon, 07 Sep 2026 04:11 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Mon, 07 Sep 2026 04:11 AM IST
सार

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उद्घोषित ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दो नजरिये हैं- सत्ता की नजर में ‘दिमागी नक्सल’ एक ‘गंभीर चुनौती’ है, तो विपक्ष के लिए वह ‘उपहास’ का ‘मुद्दा’ है। दरअसल यह कोई मजाक नहीं, बल्कि विचार से विचार और मिथक से मिथक की लड़ाई है।

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Two perspectives on Dimagi Naxals serious challenge in eyes of ruling dispensation ridiculous for opposition
एक ही समय में कॉकरोच, जेन-जी और दिमागी नक्सल के मिथक (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

एक ही समय में तीन ‘मिथक’ मथे जा रहे हैं। एक है ‘कॉकरोच’ का मिथक, दूसरा है, ‘जेन-जी का मिथक’ और तीसरा है ‘दिमागी नक्सल’ का मिथक! ये मिथक कब एक-दूसरे में मिक्स हो जाते हैं, कब ‘नैरेटिव’ बन जाते हैं, कब ‘राजनीतिक विमर्श’ बन जाते हैं, कब ‘अव्याख्येय’ हो जाते हैं, और कब ‘रहस्य’ या ‘पहेली’ बन जाते हैं, कोई नहीं जानता। मीडिया डराता रहता है कि ‘जेन-जी’ यह है, वह है, कि ‘जेन-जी’ भूत है, प्रेत है, कि ‘जेन-जी’ आ जाएगा और आपको खा जाएगा...जबकि ‘जेन-जी’ एक ‘पीढी’ भर है, जो कब किसी की ‘सीढ़ी’ बन जाए, कब किसी की ‘बीड़ी’ बन जाए और कब ‘बूढी’ हो जाए, वह भी  नहीं जानती। बहरहाल, याद रखें कि ‘मिथक’ अतीत कथाओं में ही नहीं होते, वे दैनिक घटनाओं व पॉपुलर शब्दों से भी बनते हैं।

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‘कॉकरोच’ का मिथक भी इसी तरह बनाः एक हल्के-फुल्के ‘कमेंट’ के ‘जबाव’ में अमरीका में बैठे कुछ लोगों ने एक ‘मजाहिया नाम’ देकर आनन-फानन में एक ऑनलाइन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बना डाली, फिर एक दिन वह दिल्ली के जंतर मंतर पर आ बैठी। और जो सरकार विपक्षी दलों से न हिली, ‘कॉकरोच पार्टी’ से हिल गई, मंत्री हिल गए, संतरी हिल गए और ‘हिट स्प्रे’ से डरने वाले ‘कॉकरोच’ मानो सरकार को डराने वाले ‘गब्बर’ हो गए, ‘मोगांबो’ हो गए। कारण यह कि कॉकरोच पार्टी एक अबूझ ‘मिथक’ की तरह आई और कमोबेश अब भी बनी हुई है...यही ‘अबूझपन’ उसकी दुर्जेयता है।
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इसी क्रम में एक ‘नया मिथक’ चलन में आयाः ‘दिमागी नक्सल’! पीएम ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर  लालकिले के संबोधन में जैसे ही कहा कि अब कुछ ‘दिमागी नक्सल’ बचे हैं, तो तुरंत कुछ ‘दिगामी नक्सल’ मैदान में आ गए और मजाक-मजाक में कहने लगे कि हमें गर्व है कि हम नक्सल हैं। यह भाषा में बना एक ‘इंस्टेट मिथक’ था...।
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‘दिमागी नक्सल’ को लेकर दो नजरिये आमने-सामने हैं-सत्ता की नजर में ‘दिमागी नक्सल’ एक ‘गंभीर चुनौती’ है, तो विपक्ष के लिए फिलहाल वह ‘उपहास’ का ‘मुद्दा’ है। कुछ चर्चक ‘दिमागी नक्सलों’ को उन ‘अर्बन नक्सलों’ का पर्याय मानते हैं, जो ‘सशस्त्र क्रांति’ में यकीन करनेवाले नक्सलों की तरह आदिवासी क्षेत्रों में नहीं रहते, बल्कि ‘महानगरों’ में रहते हैं, साधन-संपन्न हैं, तकनीक सेवी हैं और वहीं से ‘नक्सलवादी विचारधारा’ के पक्ष में समर्थन जुटाते हैं, ‘कवर फायर’ देते हैं। इस ‘दिमागी नक्सल’ का स्रोत वही ‘नक्सलवादी आंदोलन’ है, जो बंगाल के एक गांव ‘नक्सलबाड़ी’ में कुछ किसानों ने 1967 में शुरू किया। तब बंगाल में सीपीएम नेता ज्योति बसु ‘संयुक्त मोर्चा सरकार’ में ‘उप मुख्यमंत्री’ थे। कुछ किसानों ने ‘नक्सलबाड़ी’ गांव के कुछ जमींदारों की जमीनों पर यह सोचकर कब्जा कर लिया कि ‘उप मुख्यमंत्री’ उनकी पार्टी का है, वह उनके खिलाफ पुलिस नहीं भेजेगा, लेकिन ज्योति बसु को पुलिस भेजकर ऐसे ‘विद्रोही किसानों’ का दमन करना पड़ा, जो ‘सीपीएम’ की किसान सभा के ही नेता थे। इससे क्षुब्ध होकर ‘चारु मजूमदार’ व ‘कानू सान्याल’ आदि कुछ किसान नेताओं ने सीपीएम से अलग होकर ‘सीपीआई एमएल’ नामक पार्टी बना ली और ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ घोषित कर दिया। ‘चीनी रेडियो’ ने इसे हवा दी, जिससे इनको ‘वैधता’ मिली। जल्दी ही आजू-बाजू के गांवों के किसान ‘सीपीएम’ छोड़ ‘सीपीआई एमएल’ में आ गए। यही ‘नक्सलवादी आंदोलन’ बन गया।

शुरू में नक्सलवादियों ने ‘सीपीएम’ को टारगेट बनाया। इनकी नजर में ‘सीपीएम’ संशोधनवादी पार्टी हो गई। बंगाल का एक बड़ा बौद्धिक वर्ग सीपीएम से छिटककर नक्सलवाद का हामी बन गया। माओ की ‘रेड बुक’ इनकी ‘पाठ्य पुस्तक’ बन गई। इसकी कुछ लाइनें जैसे ‘एक चिंगारी सारे जंगल को आग लगा देती है’, ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’ आदि ‘मुक्ति’ के मंत्र बन गए। आंध्रप्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ के आदिवासी इलाकों में इनका असर तेजी से बढ़ा। ये जंगलों में ‘छापामार युद्ध’ चलाने लगे व कई जगह ‘मुक्तिक्षेत्र’ बना  अपनी ‘सरकारें’ चलाने लगे। नेताओं व सुरक्षा बलों को अक्सर बमों व सुरंगों से उड़ाते रहे। सत्तर के दशक में बहुत से निराश, बेरोजगार पढ़े- लिखे लोगों  को ‘इंस्टेंट कॉफी’ की तरह ‘इस्टेंट क्रांति’ का विचार ‘रोमांटिक’ लगता। चीन में माओ की ‘लॉन्ग मार्च’, और क्यूबा में चे ग्वेवारा व फिदेल कास्त्रो आदि की ‘सशस्त्र क्रांति’ का विचार आकर्षक लगता, लेकिन कुछ समय बाद ‘सीपीआई एमएल’ के करीब छत्तीस गुट बन गए। फिर बहुत से एक हो गए। उधर सत्ता की दबिश बढ़़ती गई और 2014 के बाद एनडीए ने दबिश इतनी बढ़ा दी कि बड़े नक्सल नेता या तो मारे गए या सरेंडर कर गए। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों के दौरान नक्सलों ने कोई 20,000 लोगों की हत्या की है, जिनमें नेताओं समेत तीन हजार सुरक्षा बलों की शहादत भी शामिल है। पर ग्लोबलाइजेशन, नए पूंजीवाद, नई तकनीकी व सोशल मीडिया क्रांति ने और 2014 के बाद एक स्थिर प्रशासन द्वारा नक्सल प्रभावित इलाकों में किए जाते तेज विकास व सुरक्षा बलों की बढ़ती यौद्धिक दक्षता व सफल ‘इंटेलीजेंस तंत्र’ के आगे नक्सलवादी आंदोलन धीरे-धीरे थकने लगा और अब तो वह एक ‘आइडिया’ भर रह गया है।


स्पष्ट है कि एक वक्त का ‘इस्टेंट रोमांटिक रिवोल्यूशनरी’ विचार धीरे-धीरे अपना मूल अर्थ खोता गया और उसकी जगह ‘अर्बन नक्सलों’ ने ले ली। शायद, अब इन्हीं को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जा रहा है। इनमें कुछ ‘फॉरेन पलट’ अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, एनजीओबाज, मानवाधिकारवादी, एडवोकेट और वोक वादी, फॉरेन फंडेड ‘टूलकिट’ आदि आते हैं, जिनमें से कई दलों के ‘थिंक टैंक’ व ‘सलाहकार’ बताए जाते हैं। सत्ता प्रवक्ताओं के मतानुसार, जो ‘टुकड़े-टुकड़े वादी’ हैं, जो देश की ‘एकता-अखंडता’ में यकीन नहीं करते, जो भारत की ‘चिकन नेक’ काटने में यकीन करते हैं, ऐसे ही लोगों को शायद ‘दिमागी नक्सल’ कहा जा रहा है। सत्ता इसी ‘दिमागी नक्सल’ को खत्म करना चाहती है। लेकिन इस ‘दिमागी नक्सल’ को खत्म करने के लिए भी ‘दिमाग’ चाहिए, जो उसी की तरह सोचे, जो इनके स्वच्छंदतावादी व अराजकतावादी स्वभाव को समझे, साथ ही अपने ‘जनतांत्रिक सिस्टम’ को इतना ‘फूलप्रूफ’ व ‘जिम्मेदार’ बनाए, कि ऐसे ‘वोकवादी’, ‘छिद्रान्वेषी’ दिमागी नक्सल सेंध न लगा सकें। कहने की जरूरत नहीं कि एक आत्म विश्वस्त, जनतांत्रिक दिमाग ही ऐसे दिमागी नक्सलों से निपट सकता है। यह विचार से विचार की लंबी लड़ाई है! यह ‘मिथक’ से ‘मिथक’ की ‘अथक’ लड़ाई है, मजाक नहीं!

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