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हितों से समझौता नहीं: व्यापार घाटे से टैरिफ तक, भारत-अमेरिका समझौते की राह में कई पेच

Wed, 07 Oct 2026 07:25 AM IST
नितिन गौतम अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 07 Oct 2026 07:25 AM IST
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सार
भारत व अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते पर अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के हालिया वक्तव्य के बाद अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान इस जटिल वार्ता की मौजूदा स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट करता है। भारत को रणनीतिक रूप से आगे बढ़ने की अपनी वर्तमान नीति पर ही चलते रहना होगा।
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india usa trade deal face challenge here is why
भारत अमेरिका ट्रेड डील - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह कहना कि बातचीत एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई है, जहां दोनों पक्षों के लिए एक-दूसरे को अतिरिक्त छूट देना संभव नहीं होगा, इस जटिल वार्ता की मौजूदा स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट करता है। हालांकि, इसके संकेत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर के हालिया बयान से ही मिल गए थे, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि फिलहाल समझौता होता नहीं दिख रहा है। 


उल्लेखनीय है कि दोनों देश फरवरी, 2025 से व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य दोनों के बीच बाजार पहुंच बढ़ाना, व्यापारिक बाधाओं को कम करना और आर्थिक संबंधों को अधिक व्यापक आधार देना है। लेकिन, बातचीत जितनी आगे बढ़ी, उतना ही यह स्पष्ट होता गया कि दोनों देशों की प्राथमिकताएं कई अहम क्षेत्रों में अलग-अलग हैं। अमेरिका लंबे समय से भारत के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। दूसरी ओर, भारत का तर्क है कि व्यापार संबंधों को केवल एक आंकड़े के आधार पर नहीं देखा जा सकता। चिंता की बड़ी वजह यह है कि अमेरिका ने हाल के समय में टैरिफ को बातचीत के औजार के बजाय दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की अमेरिकी धमकी ने भारत के सामने एक जटिल स्थिति पैदा कर दी है। 


भारत के लिए रूसी तेल केवल व्यापार का सवाल नहीं है, बल्कि सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति का भी विषय है। यही वह बिंदु है, जहां व्यापार नीति और विदेश नीति एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। यदि भारत केवल अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच हासिल करने के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा या विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण विकल्पों को सीमित करता है, तो अल्पकालिक व्यापार लाभ के बदले दीर्घकालिक रणनीतिक नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को कमजोर करना भी भारत के हित में नहीं है। चुनौती दोनों जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की है।

अमेरिकी कंपनियां भारत के कृषि बाजार में अधिक पहुंच चाहती हैं, लेकिन भारतीय किसानों के हितों और खाद्य सुरक्षा की चिंता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखते हुए भी भारत अपने व्यापारिक विकल्पों को सीमित नहीं कर रहा है और नए बाजारों की तलाश कर रहा है, ताकि उसे निर्यात के लिए अधिक व्यापक आधार मिल सके। यह स्थिति उसे किसी समझौते में अपने दीर्घकालिक हितों को अधिक मजबूती से रखने का अवसर देगी, क्योंकि समझौता हो जाने से अधिक जरूरी है कि सही समझौता हो।
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