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एक्सप्लेनर: टाटा ट्रस्ट्स बनाम टाटा संस की लड़ाई में उतरे वकीलों में क्या खास, कोर्ट में रखे जाएंगे कैसे तर्क?
Mon, 21 Sep 2026 06:16 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 21 Sep 2026 06:16 PM IST
सार
TATA Sons vs TATA Trusts: साइरस मिस्त्री केस में एक साथ लड़े हरीश साल्वे और अभिषेक सिंघवी अब टाटा के अंदरूनी विवाद में क्यों भिड़े? जानिए इनकी फीस, आर्टिकल 121 और दोनों पक्षों की कानूनी रणनीति...
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टाटा संस बनाम टाटा ट्रस्ट्स का विवाद।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
टाटा संस की एक बोर्ड रूम बैठक में हुए कुछ फैसलों का मामला अब कानूनी लड़ाई में बदलता दिख रहा है। दरअसल, टाटा संस के भविष्य और इसके प्रमुख की नियुक्ति को लेकर बोर्ड की बैठक में जो फैसला हुआ, वह भले ही बहुमत से था, लेकिन इसमें टाटा संस की सबसे बड़ी हिस्सेदार कंपनी टाटा ट्रस्ट्स (66% हिस्सा) के प्रमुख नोएल टाटा की सहमति नहीं थी। चौंकाने वाली बात यह है कि टाटा ट्र्स्ट्स के दूसरे नामित सदस्य वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड के साथ थे, लेकिन सिर्फ नोएल टाटा की असहमति के चलते अब टाटा की यह अंदरूनी लड़ाई अदालत की चौखट तक पहुंच गई है।
इसके लिए दोनों पक्षों ने वकीलों की फौज भी खड़ी कर दी है। देश की नामी कानूनी फर्म्स और जाने-माने वकील सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए हैं और यही वकील आगे मामले के अदालती स्तर पर जाने पर टाटा नेतृत्व विवाद के निपटारे में भी आगे रह सकते हैं।
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इसके लिए दोनों पक्षों ने वकीलों की फौज भी खड़ी कर दी है। देश की नामी कानूनी फर्म्स और जाने-माने वकील सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए हैं और यही वकील आगे मामले के अदालती स्तर पर जाने पर टाटा नेतृत्व विवाद के निपटारे में भी आगे रह सकते हैं।
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टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के विवाद के बीच बोर्ड रूम के बाहर यह जंग अब किस मोड़ पर जाती दिख रही है? दोनों पक्षों की तरफ से किस-किस वकील को प्रतिनिधि के तौर पर शामिल किया गया है? जिन वकीलों ने इस मुकाबले में होने की पुष्टि की है, वह कौन हैं और कानूनी जगत का कितना बड़ा नाम हैं? इन वकीलों की नियुक्ति पर टाटा समूह में ही कैसे खींचतान शुरू हो गई है? आइये जानते हैं...
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टाटा संस बनाम टाटा ट्रस्ट्स का विवाद।
- फोटो : अमर उजाला
किस मोड़ पर जा रही टाटा संस बनाम टाटा ट्रस्ट्स की जंग?
नोएल टाटा की अध्यक्षता वाली टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से टाटा संस की बोर्ड बैठक में हुए फैसलों को कानूनी तौर पर चुनौती देने की तैयारी कर ली गई है। नोएल की तरफ से दो बार इस विवाद पर बयान जारी किया जा चुका है और रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब उनकी ओर से बोर्ड के फैसलों को अवैध करार देने पर बस टाटा संस की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। इसके बाद ही टाटा ट्रस्ट्स निर्णय करेगा कि यह मामला कानूनी राह पकड़ेगा या बातचीत का रास्ता थामेगा। फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स ने बॉम्बे हाईकोर्ट या नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) जाने पर विचार किया है।दोनों पक्षों की तरफ से किस-किस वकील को प्रतिनिधि बनाया गया?
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस की तरफ से इस विवाद में अपने प्रतिनिधित्व के लिए देश की कुछ शीर्ष कानूनी फर्म्स और वकीलों का दामन थामा है। जहां हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे देश के नामी वकीलों ने इस मामले से जुड़ने की पुष्टि कर दी है, वहीं कुछ और नामों के भी इस केस से जुड़ने की बात सामने आई है।
टाटा ट्रस्ट बनाम टाटा संस के वकील।
- फोटो : अमर उजाला
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस की तरफ से जिन वकीलों की सेवाएं लेने की पुष्टि हुई है, उनमें हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी का नाम है। यह दोनों ही वकील भारत के सबसे लोकप्रिय और महंगे वकीलों में से एक हैं। इसके अलावा टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से मुकुल रोहतगी, एसपी चिनॉय, जनक द्वारकादास और टाटा संस की तरफ से रवि कदम की भी सेवाएं लेने की चर्चाएं हैं। हालांकि, स्वतंत्र स्रोतों में इन नामों की पुष्टि नहीं हुई है।
शुरुआती जीवन
कौन हैं हरीश साल्वे?
शुरुआती जीवन
- हरीश साल्वे पूर्व सॉलिसिटर जनरल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर के कानूनी विशेषज्ञ हैं। वे देश के सबसे प्रभावशाली और शीर्ष वकीलों में शामिल हैं।
- उनका जन्म 22 जून 1955 को महाराष्ट्र के धुले में हुआ। उनके पिता एनकेपी. साल्वे जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट और अपने समय के अनुभवी नेता रहे थे।
- उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से बी.कॉम और एलएलबी की पढ़ाई की और चार्टर्ड अकाउंटेंसी की परीक्षा भी पास की की।
- भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शरद अरविंद बोबडे स्कूल में उनके साथ पढ़े थे।
- हरीश साल्वे ने 1980 में वकालत की शुरुआत की और नानी पालकीवाला तथा सोली सोराबजी जैसे कानूनी दिग्गजों के साथ काम किया।
हरीश साल्वे।
- फोटो : अमर उजाला
चर्चित और हाई-प्रोफाइल मामले
टाटा ग्रुप से भी जुड़ाव
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में पाकिस्तान के खिलाफ कुलभूषण जाधव केस में भारत का सफल प्रतिनिधित्व किया और भारत सरकार से फीस के रूप में सिर्फ 1 रुपये की सांकेतिक फीस ली।
- वे देश के बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट्स के भरोसेमंद सलाहकार रहे हैं। उन्होंने मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े कृष्णा गोदावरी बेसिन गैस विवाद, वोडाफोन के $2.5 अरब के टैक्स विवाद, आईटीसी के मामलों की पैरवी की है।
- इसके अलावा उन्होंने सलमान खान के हिट-एंड-रन केस में अभिनेता का पक्ष रखा। आरुषि-हेमराज हत्याकांड मामले में उन्होंने आरुषि के माता-पिता के बचाव में पैरवी की। इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तरफ से बिलकिस बानो मामले में भी वकील रहे।
टाटा ग्रुप से भी जुड़ाव
- हरीश साल्वे का टाटा समूह से पुराना जुड़ाव रहा है। बताया जाता है कि 2010 में जब रतन टाटा ने अपने निजता के अधिकार के उल्लंघन का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया तो उन्होंने सीधा हरीश साल्वे को फोन कर अपने मामले की पैरवी के लिए कहा।
- टाटा समूह में जब साइरस मिस्त्री को हटाने को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, तब भी रतन टाटा की तरफ से हरीश साल्वे को ही वकील रखा गया था। इस मामले में टाटा संस को मिस्त्री के खिलाफ जीत मिली थी।
- एक बार फिर टाटा संस बनाम टाटा ट्रस्ट्स विवाद में हरीश साल्वे टाटा संस और एन. चंद्रशेखरन के मुख्य कानूनी सलाहकार हैं। वे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नियमों का पालन करते हुए टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग और इसे एक सार्वजनिक कंपनी के ढांचे में बदलने का समर्थन कर रहे हैं।
कौन हैं अभिषेक मनु सिंघवी?
शुरुआती जीवन- अभिषेक मनु सिंघवी का जन्म 24 फरवरी 1959 को राजस्थान के जोधपुर में हुआ। उनके पिता डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी एक जाने-माने कानूनविद, राजनयिक और ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त थे।
- उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एमए. और पीएचडी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। कैम्ब्रिज में उनकी डॉक्टरेट की थीसिस आपातकालीन शक्तियों पर थी।
अभिषेक मनु सिंघवी।
- फोटो : अमर उजाला
चर्चित और हाई-प्रोफाइल मामले
हरीश साल्वे और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने भारत के दो सबसे बड़े और हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट मुकदमों में एक ही पक्ष की ओर से एक साथ कानूनी लड़ाई लड़ी है।
- अभिषेक सिंघवी की तरफ से राहुल गांधी की मोदी सरनेम मानहानि मामले में, अरविंद केजरीवाल-मनीष सिसोदिया की दिल्ली आबकारी नीति केस में और सोनिया गांधी के नेशनल हेराल्ड केस जैसे बड़े मामलों में पैरवी की गई है।
- नवीन जिंदल केस में नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार दिलवाने वाले केस में भी वे वकील के तौर पर जुड़े थे। इसके अलावा मुकेश अंबानी के कृष्णा गोदावरी बेसिन गैस विवाद, भारती एयरटेल और वोडाफोन जैसे बड़े टेलीकॉम विवादों में वकील रहे हैं।
साथ में कौन से केस लड़े साल्वे और सिंघवी?
हरीश साल्वे और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने भारत के दो सबसे बड़े और हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट मुकदमों में एक ही पक्ष की ओर से एक साथ कानूनी लड़ाई लड़ी है।
1. टाटा संस बनाम साइरस मिस्त्री मामला (2016–2021)
मामला: जब साइरस मिस्त्री को टाटा संस के अध्यक्ष पद से हटाया गया था, तब खड़ा हुआ विवाद देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट मुकदमों में से एक बना।साथ में भूमिका: इस केस में हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी दोनों ने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स (सम्मिलित पक्ष) के पक्ष में एक ही लीगल टीम का हिस्सा बनकर अदालत में पैरवी की थी। उन्होंने मिस्त्री को हटाने के फैसले को कानून सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट तक टाटा समूह का केस जीता था।
2. मुकेश अंबानी बनाम अनिल अंबानी बेसिन विवाद
मामला: रिलायंस इंडस्ट्रीज (मुकेश अंबानी) और रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज (अनिल अंबानी) के बीच कृष्णा गोदावरी बेसिन से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर बड़ा कानूनी विवाद हुआ था।
साथ में भूमिका: इस ऐतिहासिक जंग में मुकेश अंबानी के पक्ष की लीगल टीम में हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी दोनों एक साथ शामिल थे। उनके साथ रोहिंगटन नरीमन भी थे। मुकेश अंबानी के वकीलों ने इस अदालती मामले में अनिल अंबानी के वकील राम जेठमलानी, मुकुल रोहतगी की टीम के खिलाफ केस लड़ा और जीता।
अब जिस मामले में खिलाफ, उस पर क्या है दोनों की राय?
1. अभिषेक मनु सिंघवी: टाटा ट्रस्ट्स-नोएल टाटा के वकील
- सिंघवी का तर्क है कि यह लड़ाई केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि 66% बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले मालिक/ट्रस्ट की सर्वोच्चता की है। उन्होंने बोर्ड को रनअवे बोर्ड करार देते हुए कहा कि 66% हिस्सेदार के स्पष्ट विरोध के बावजूद बोर्ड स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकता; ऐसा होना देश भर में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए घातक होगा।
- उनका कहना है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (अनुच्छेद 121) के तहत ट्रस्ट की ओर से नामित निदेशकों की बहुमत सहमति अनिवार्य है। दो नामित निदेशकों में से एक के विरोध करने पर गतिरोध पैदा होता है, और इसे तोड़ने के लिए टाटा संस के चेयरमैन का वोट करना ट्रस्ट की अनिवार्य सहमति का विकल्प नहीं बन सकता। इसलिए एन. चंद्रशेखरन के पुनर्नियोजन का प्रस्ताव शुरुआत से ही अमान्य है।
- उन्होंने जमशेदजी टाटा की ओर से स्थापित किए गए मॉडल का हवाला देते हुए कहा कि टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच के इस जन्म के रिश्ते को तोड़ना समूह के मूल विजन पर हमला है। उन्होंने कहा कि टाटा संस के चेयरमैन की नियुक्ति के बीच में लिस्टिंग का मुद्दा उठाना मुख्य कानूनी विवाद से ध्यान भटकाने का एक बहाना है।
2. हरीश साल्वे का पक्ष: टाटा संस-एन. चंद्रशेखरन के वकील
- साल्वे का कहना है कि टाटा संस की कानूनी स्थिति पूरी तरह मजबूत और वैध है। साल्वे का मुख्य तर्क यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से टाटा संस को अपर-लेयर नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कॉरपोरेशन यानी एनबीएफसी के तौर पर वर्गीकृत किए जाने के कारण कंपनी को सार्वजनिक बनाना और लिस्ट कराना अनिवार्य है।
- साल्वे का कहना है कि एक बार पब्लिक कंपनी बनने के बाद आर्टिकल्स के प्रतिबंध वाले नियम अपने आप खत्म हो जाएंगे। साल्वे का कहना है कि शेयरधारक की मर्जी बनाम बोर्ड के अधिकारों पर बहस करना असल मुद्दे- नियामक और लिस्टिंग से ध्यान भटकाने की कानूनी रणनीति है।
- उनका तर्क है कि 270 अरब डॉलर वाले इस विशाल साम्राज्य को कुछ ट्रस्टियों के आपसी मतभेद के कारण शक्तिहीन नहीं छोड़ा जा सकता। टाटा समूह भारत का चेहरा है, इसलिए इसे शीर्ष पेशेवर प्रबंधन और पूर्ण सार्वजनिक पारदर्शिता के साथ चलाया जाना चाहिए, न कि केवल कुछ ट्रस्टियों द्वारा।
और आखिर में- कौन देगा इन वकीलों की फीस, इस पर क्या विवाद?
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में टाटा समूह के मामलों से जुड़े दो जानकारों के मुताबिक, इस पूरे कानूनी मामले का खर्च टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से उठाया जाएगा। पहले टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि इससे जुड़े सभी याचिकाओं का खर्च ट्रस्ट की तरफ से उठाया जाएगा। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के दो ट्रस्टी- विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन ने तब भी इस तरह के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किया था। दोनों का तर्क था कि टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े कानूनी मामलों के खर्च उठाने का फैसला केस की प्रकृति के आधार पर तय होना चाहिए।इन सबके बीच विवाद में यह सवाल भी उठा है कि क्या परोपकारी कामों- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बने ट्रस्ट के फंड का इस्तेमाल इस तरह के कॉरपोरेट मुकदमों की फीस भरने के लिए किया जा सकता है। इस संभावना पर टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (टीएडीटी) के प्रमुख मेहली मिस्त्री जैसे सदस्यों ने आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि वे टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मुकदमेबाजी की आशंका से निराश हैं, क्योंकि यह समूह के 150 साल से ज्यादा के इतिहास में अप्रत्याशित है।