कोर्ट ने कहा कि बैंक या ऋणदाता इस बात के लिए बाध्य नहीं है कि वह गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले मुख्य कर्जदार से वसूली के सभी उपाय खत्म करे। यह पूरी तरह से बैंक (डिक्री-धारक) का विवेक है कि वह किससे पहले वसूली करना चाहता है। अदालत ने याचिकाकर्ता (गारंटरों) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने निचली अदालत की ओर से उनकी संपत्ति की नीलामी के आदेश को चुनौती दी थी। गौरतलब है कि कांगड़ा सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक ने साल 2009 में मेसर्स अखिल स्टील ट्रेडर्स को 10 लाख रुपये का कैश क्रेडिट लोन दिया था।
इस लोन के लिए विनोद कुमार और नरेश कुमार (याचिकाकर्ता) ने गारंटर के रूप में गारंटी डीड निष्पादित की थी। कर्जदार की ओर से भुगतान न करने पर बैंक ने 2012 में 10.99 लाख रुपये की वसूली के लिए सिविल कोर्ट, नादौन (हमीरपुर) में मुकदमा दायर किया। 2019 में अदालत ने तीनों देनदारों को संयुक्त रूप से और अलग-अलग यह राशि 12.50 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया। निचली अदालत के फैसले को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी गई, जिससे वह फैसला अंतिम हो गया। इसके बाद निष्पादन कार्यवाही के दौरान वरिष्ठ सिविल जज नादौन ने 28 मार्च 2026 को गारंटी देने वालों की संपत्ति बेचकर बैंक की बकाया राशि वसूलने के लिए कलेक्टर को वारंट जारी करने का आदेश दिया। इसी आदेश को गारंटरों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।