उठा के नाज़ से दामन भला किधर को चले
इधर तो देखिए बहर-ए-ख़ुदा किधर को चले
मिरी निगाहों में दोनों जहाँ हुए तारीक
ये आप खोल के ज़ुल्फ़-ए-दुता किधर को चले
अभी तो आए हो जल्दी कहाँ है जाने की
उठो न...और पढ़ें
नहीं हम में कोई अन-बन नहीं है
बस इतना है कि अब वो मन नहीं है
मैं अपने आप को सुलझा रहा हूँ
तुम्हें ले कर कोई उलझन नहीं है
मुझे तुम ग़ैर भी क्यों कह रहे हो
भला क्या ये भी अपना-पन नहीं है
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तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए
मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए
कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए
उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में
ख़ुशबू लुटा रही थी कि तु...और पढ़ें
वो जिसका तीर चुपके से जिगर के पास होता है
वो कोई ग़ैर क्या अपना ही रिश्तेदार होता है
किसी से अपने दिल की बात कहना तुम न भूले से
यहाँ ख़त भी ज़रा सी देर में अखबार होता है
हमारे सुख से दुःख उनको हमारे दुःख से...और पढ़ें
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए
ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें
बहुत कठिन है बिखरने का हौसला रखना
सबब तुम्हीं हो मगर तुम से क्या गिला रखना
न जाने कौन से मौसम से साबिक़ा पड़ जाए
हमारे हक़ में दुआओं का सिलसिला रखना
ख़ुदा करे कि उसे अपनी बात याद रहे
गया है क...और पढ़ें
मौसम-ए-गुलज़ार-ए-हस्ती इन दिनों क्या है न पूछ
तू ने जो देखा सुना क्या मैं ने देखा है न पूछ
हाथ ज़ख़्मी हैं तो पलकों से गुल-ए-मंज़र उठा
फूल तेरे हैं न मेरे बाग़ किस का है न पूछ
रात अँधेरी है तो अपने...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें