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कैंसर की 2700 की दवा पर 27 हजार की एमआरपी: सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त, कहा- अगर यह वसूली नहीं तो और क्या है?

Wed, 23 Sep 2026 04:55 AM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Wed, 23 Sep 2026 04:55 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवा की खरीद कीमत और उसकी एमआरपी में कई गुना अंतर पर कड़ी नाराजगी जताई। 2,700 रुपये में मिलने वाली दवा पर 27,000 रुपये की एमआरपी के मामले में अदालत ने इसे ‘दिनदहाड़े डकैती’ बताया। कोर्ट ने कैंसर मरीजों की आर्थिक मजबूरी, अधिकारियों की कथित चुप्पी और सरकारी योजनाओं में करदाताओं के पैसे से होने वाले भुगतान पर भी गंभीर सवाल उठाए। 

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MRP of 27000 on cancer drug costing 2700 Supreme Court gets tough asks If this isn't profiteering then what is
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा अगर दुकानदार को 2,700 रुपये में मिलती है और उसी दवा पर 27,000 रुपये की एमआरपी छपी हो, तो मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जाए? इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि कैंसर के मरीज इलाज के लिए अपने घर और गहने तक बेच देते हैं, ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमत में इस तरह का भारी अंतर मरीजों के लिए असहनीय बोझ है। कोर्ट ने इसे बेहद तल्ख शब्दों में ‘दिनदहाड़े डकैती’ तक करार दिया।

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कोर्ट ने पूछा- आखिर क्यों?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और दवा की सप्लाई चेन में मुनाफाखोरी का मुद्दा उठाया गया है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने ऐसा मामला आया, जिसमें खुदरा विक्रेता को कैंसर की दवा करीब 2,700 रुपये में मिल रही थी, लेकिन उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP 27,000 रुपये दर्ज था। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि जब निर्माता या सप्लायर दवा 2,700 रुपये में दे रहा है तो मरीज से 27,000 रुपये क्यों लिए जाएं?
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‘अगर यह जबरन वसूली नहीं तो और क्या है?’
सुप्रीम कोर्ट ने इस भारी कीमत के अंतर पर बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मरीज को इस तरह कैसे ठगा जा सकता है। अगर इसे जबरन वसूली नहीं कहा जाए तो फिर और क्या कहा जाएगा? कोर्ट ने साफ शब्दों में इसे ‘दिनदहाड़े डकैती’ बताया। पीठ ने कहा कि कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे मरीज पहले ही इलाज के भारी खर्च से परेशान होते हैं। कई परिवार इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं पर कई गुना ज्यादा कीमत वसूलना मरीजों की परेशानी को और बढ़ा देता है।
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जिन अधिकारियों को कार्रवाई करनी चाहिए, वे चुप क्यों?
जस्टिस संदीप मेहता ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जिन अधिकारियों और संबंधित प्राधिकारों को इस तरह के मामलों में कार्रवाई करनी चाहिए, वे पूरी तरह खामोश हैं। पीठ ने कहा कि यह सवाल भी उठता है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी ऐसे मामलों में कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाने वाली ऐसी व्यवस्था पर जिम्मेदार लोगों की चुप्पी चिंता का विषय है।

कोर्ट ने करदाताओं के पैसे का सवाल उठाया
सुनवाई के दौरान एक और अहम मुद्दा सामने आया। अदालत को बताया गया कि आयुष योजना के तहत मरीजों के इलाज में दवाओं की कीमत का भुगतान आखिरकार सरकार से जुड़ता है। यानी अस्पताल महंगी कीमत पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में उस खर्च का भुगतान सरकार की ओर से किया जाता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आखिर यह पैसा करदाताओं का ही होता है। अगर दवा कम कीमत में उपलब्ध है और उसके लिए कई गुना ज्यादा रकम सरकारी भुगतान के जरिए ली जा रही है, तो यह करदाताओं के साथ धोखाधड़ी का मामला बनता है।


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कुछ राज्यों में कैंसर को अभी तक अधिसूचित बीमारी नहीं माना गया
एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का मुद्दा भी उठा। अदालत को बताया गया कि कुछ राज्यों ने अभी तक कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित नहीं किया है। इससे बीमारी की निगरानी और उससे जुड़ी व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।  

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