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मक्का समझौते की खुली पोल: पाकिस्तान-तुर्किये पीछे हटे, सऊदी अरब ने हूती हमलों से बचने को इस्राइल से मांगी मदद
Tue, 15 Sep 2026 05:27 PM IST
देवेश त्रिपाठी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेल अवीव
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेल अवीव
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 15 Sep 2026 05:27 PM IST
सार
यमन में हूती लड़ाकों के बढ़ते नियंत्रण और सऊदी अरब में हमलों ने मक्का रक्षा समझौते पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब के पारंपरिक सहयोगी पाकिस्तान ने यमन में सैन्य कार्रवाई में हिस्सा लेने से इनकार किया है। हालांकि, उसने सऊदी क्षेत्र की रक्षा के लिए अपनी सेनाएं उपलब्ध कराने की बात कही है। आइए जानते हैं इस मामले से जुड़ा हर एक सवाल...
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मक्का रक्षा समझौता
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सऊदी अरब के सामने यमन में हूती लड़ाकों के बढ़ते प्रभाव के बीच बड़ा सुरक्षा संकट खड़ा हो गया है। लाल सागर के तट और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बड़े हिस्से पर हूतियों के कब्जे के बाद सऊदी अरब अपने ही सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य मदद नहीं जुटा पा रहा है। खास तौर पर मक्का रक्षा समझौते के साझेदार पाकिस्तान और तुर्किये ने यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल होने से दूरी बना ली है। ऐसे में सऊदी अरब ने अमेरिका की सेंट्रल कमांड के जरिए इस्राइल से खुफिया मदद मांगने का रास्ता अपनाया है।
यह घटनाक्रम सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते पर गंभीर सवाल खड़े करता है। समझौते में एक साझेदार पर सैन्य हमला पूरे गठबंधन पर हमला माने जाने और उसके खिलाफ मिलकर जवाब देने की बात कही गई थी। इसके बावजूद हूती हमलों और यमन में बदलते हालात के बीच पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य भागीदारी नजर नहीं आ रही है। वहीं, सऊदी अरब को ऐसे देश से अप्रत्यक्ष मदद मांगनी पड़ रही है, जिसे वह स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता तक नहीं देता है।
सऊदी अरब और इस्राइल के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं और रियाद इस्राइल को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता भी नहीं देता। ऐसे में सेंटकॉम के जरिए अप्रत्यक्ष संपर्क की खबर यमन संकट की गंभीरता को दिखाती है।
तुर्किये भी यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में सऊदी अरब के साथ सीधे उतरता नहीं दिख रहा है। ऐसे में मक्का रक्षा समझौते के दोनों प्रमुख साझेदारों की सीमित भूमिका ने इस गठबंधन की वास्तविक सैन्य क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौजूदा घटनाक्रम से यही सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है कि अगर साझा रक्षा समझौता अपने पहले बड़े क्षेत्रीय संकट में ही सीमित साबित होता है, तो भविष्य में यह गठबंधन किसी बड़े सैन्य खतरे का कितना प्रभावी जवाब दे पाएगा। फिलहाल मक्का रक्षा समझौता जमीन पर उतना प्रभावी दिखाई नहीं दे रहा है, जितना उसे बनाए जाते समय बताया गया था।
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यह घटनाक्रम सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते पर गंभीर सवाल खड़े करता है। समझौते में एक साझेदार पर सैन्य हमला पूरे गठबंधन पर हमला माने जाने और उसके खिलाफ मिलकर जवाब देने की बात कही गई थी। इसके बावजूद हूती हमलों और यमन में बदलते हालात के बीच पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य भागीदारी नजर नहीं आ रही है। वहीं, सऊदी अरब को ऐसे देश से अप्रत्यक्ष मदद मांगनी पड़ रही है, जिसे वह स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता तक नहीं देता है।
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सऊदी अरब के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
- सऊदी अरब के सामने यमन में हूती लड़ाकों के बढ़ते प्रभाव के कारण गंभीर सुरक्षा और ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है। हूतियों ने पिछले सप्ताह लाल सागर के तट और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। इसके साथ ही जलडमरूमध्य के महत्वपूर्ण द्वीपों पर भी उनका नियंत्रण हो गया है।
- हूती नेताओं ने कहा है कि जुलाई से लागू सऊदी जहाजों की नाकाबंदी जारी रहेगी, जबकि अमेरिका और दूसरे देशों के जहाजों को जलडमरूमध्य से स्वतंत्र रूप से गुजरने की अनुमति होगी। इससे सऊदी अरब के लिए समुद्री रास्ते से तेल के परिवहन पर दबाव बढ़ गया है।
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बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य सऊदी अरब के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
बाब अल-मंदेब लाल सागर का प्रवेश द्वार है और स्वेज नहर तक पहुंचने वाला प्रमुख समुद्री मार्ग है। सऊदी अरब के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसके जरिए वह होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित ईरानी नाकाबंदी से बचते हुए तेल का परिवहन कर सकता है। बाब अल-मंदेब के रास्ते में रुकावट आने से सऊदी अरब के तेल निर्यात पर सीधा असर पड़ सकता है। इसके अलावा देश के बड़े पाइपलाइन नेटवर्क पर हुए हमलों ने ऊर्जा ढांचे को और कमजोर कर दिया है।हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या असर पड़ा है?
हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे पर कई हफ्तों तक ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इन हमलों में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, वायुसेना ठिकानों और प्रमुख शहरों को भी निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। इससे सऊदी अरब की तेल निर्यात क्षमता के गंभीर रूप से प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है।सऊदी अरब ने इस्राइल से मदद क्यों मांगी?
हूतियों के बढ़ते प्रभाव और अपने सहयोगियों की सीमित मदद के बीच सऊदी अरब ने अप्रत्यक्ष रूप से इस्राइल से खुफिया सहायता मांगने का रास्ता अपनाया है। 'द जेरूसलम पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता में इस्राइल और सऊदी अरब के बीच बातचीत हुई। इसका उद्देश्य हूती सैन्य गतिविधियों से जुड़े खतरों को लेकर सऊदी अरब को खुफिया जानकारी उपलब्ध कराना था।
सऊदी अरब और इस्राइल के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं और रियाद इस्राइल को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता भी नहीं देता। ऐसे में सेंटकॉम के जरिए अप्रत्यक्ष संपर्क की खबर यमन संकट की गंभीरता को दिखाती है।
क्या सऊदी अरब ने सिर्फ इस्राइल से ही मदद मांगी है?
'इस्राइल हायोम' की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के युवराज और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने हूती हमलों से निपटने के लिए दूसरे खाड़ी देशों और मिस्र से भी मदद मांगी है। हालांकि, रियाद की अपील को अब तक व्यापक समर्थन नहीं मिला है।पाकिस्तान-तुर्किये ने सऊदी अरब की मदद से इनकार क्यों किया?
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच मक्का रक्षा समझौता हुआ है। इसमें किसी एक साझेदार पर सैन्य हमला पूरे गठबंधन पर हमला माने जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद पाकिस्तान ने कथित तौर पर यमन में हूतियों से लड़ने के लिए अपने सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। इस्लामाबाद का कहना है कि उसकी सेनाएं सऊदी क्षेत्र की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती हैं, लेकिन पाकिस्तान किसी दूसरे देश की जमीन पर सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेगा।तुर्किये भी यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में सऊदी अरब के साथ सीधे उतरता नहीं दिख रहा है। ऐसे में मक्का रक्षा समझौते के दोनों प्रमुख साझेदारों की सीमित भूमिका ने इस गठबंधन की वास्तविक सैन्य क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मक्का रक्षा समझौता क्या है?
सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने और किसी बाहरी सैन्य खतरे की स्थिति में सामूहिक जवाब देने की व्यवस्था के तौर पर पेश किया गया था। समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी एक साझेदार पर सैन्य हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाएगा और उसके खिलाफ सामूहिक रूप से जवाब देने की बात कही गई है।मक्का समझौते पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
समझौते के बाद सामने आए यमन संकट ने इसकी व्यावहारिक क्षमता की परीक्षा ले ली है। सऊदी अरब हूती हमलों का सामना कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान और तुर्किये ने यमन में सीधे सैन्य अभियान से दूरी बना ली है। समझौते को लेकर यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या उसके पास स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रियाएं और साझा सैन्य सिद्धांत हैं।ईरान के साथ चल रहे संघर्ष का इस पूरे संकट से क्या संबंध है?
ईरान और उसके सहयोगी संगठन खाड़ी क्षेत्र में लगातार दबाव बनाए हुए हैं। ईरान की ओर से बैलिस्टिक मिसाइलों के इस्तेमाल के अलावा यमन में हूती और इराक में हिजबुल्ला भी संघर्ष में सक्रिय हैं। इससे खाड़ी देशों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य और स्वेज नहर से जुड़े दोनों प्रमुख समुद्री मार्गों पर खतरा पैदा हो गया है। अमेरिका की ओर से हथियारों के सीमित भंडार के बीच खाड़ी देशों को ईरानी मिसाइलों और सशस्त्र ड्रोन का मुकाबला खुद करने की चुनौती भी बनी हुई है।क्या सऊदी अरब के पास दूसरे विकल्प भी हैं?
सऊदी अरब ने खाड़ी के दूसरे देशों और मिस्र से भी मदद मांगी है। इसके अलावा इस्राइल से संभावित खुफिया सहयोग का रास्ता सामने आया है। हालांकि, इस सहयोग के सैन्य कार्रवाई के बजाय मुख्य रूप से खुफिया जानकारी साझा करने तक सीमित रहने की संभावना बताई गई है।
इस्राइल के लिए भी हूती खतरा क्यों अहम है?
2023 के अंत में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में इस्राइल से जुड़े जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया था। ऐसे में बाब अल-मंदेब में हूती लड़ाकों का बढ़ता नियंत्रण इस्राइल के लिए भी सुरक्षा और आर्थिक चिंता का विषय है। 'इस्राइल हायोम' ने संभावित हूती रॉकेट हमलों से इस्राइली शहरों को होने वाले खतरे और लाल सागर में एक और नाकाबंदी से होने वाले आर्थिक नुकसान को लेकर चिंता जताई है।इस्राइल हूती लड़ाकों के खिलाफ सीधे कार्रवाई करेगा?
इसकी संभावना फिलहाल स्पष्ट नहीं है। 'हारेत्ज' के मुताबिक, इस्राइली रक्षा बलों के अधिकारियों ने सिफारिश की है कि लाल सागर में हूती हमलों के जवाब में कोई भी इस्राइली कार्रवाई अकेले करने के बजाय व्यापक अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय गठबंधन के हिस्से के रूप में की जाए।मक्का समझौते का भविष्य अब क्या दिखाई देता है?
मौजूदा हालात ने समझौते की वास्तविक सैन्य क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सऊदी अरब हूती हमलों का सामना कर रहा है, दूसरी ओर समझौते के प्रमुख साझेदार पाकिस्तान और तुर्किये यमन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से पीछे हैं। इसके कारण इस गठबंधन को लेकर किए गए बड़े दावों की दोबारा समीक्षा की जरूरत महसूस हो रही है।मौजूदा घटनाक्रम से यही सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है कि अगर साझा रक्षा समझौता अपने पहले बड़े क्षेत्रीय संकट में ही सीमित साबित होता है, तो भविष्य में यह गठबंधन किसी बड़े सैन्य खतरे का कितना प्रभावी जवाब दे पाएगा। फिलहाल मक्का रक्षा समझौता जमीन पर उतना प्रभावी दिखाई नहीं दे रहा है, जितना उसे बनाए जाते समय बताया गया था।