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'एआई आशा के साथ चिंता भी': जयशंकर बोले- देश अपने सिस्टम विकसित करने को स्वतंत्र, दुरुपयोग से आगाह कर क्या कहा?
Sun, 27 Sep 2026 12:00 AM IST
प्रशांत तिवारी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sun, 27 Sep 2026 12:00 AM IST
सार
यूएन महासभा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एआई के विकास और इस्तेमाल को लेकर कहा कि हर देश को अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार फैसले लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने एआई के फायदे और संभावित दुरुपयोग के खतरों की तरफ भी इशारा किया।
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एस जयशंकर, विदेश मंत्री
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
संयुक्त राष्ट्र महासभा में शनिवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर भारत का नजरिया साफ किया। उन्होंने कहा कि हर देश को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से एआई सिस्टम विकसित करे और तय करे कि उनका इस्तेमाल किस तरह किया जाए। जयशंकर ने बदलती दुनिया में देशों की ज्यादा भागीदारी और उनकी आवाज को महत्व देने की भी पैरवी की।
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एआई का रास्ता हर देश खुद तय करे
जयशंकर ने कहा, 'हम हर देश के अपने इकोसिस्टम को आकार देने के अधिकार में विश्वास करते हैं।' एआई मॉडल के विकास और उनके इस्तेमाल को लेकर उन्होंने कहा कि देशों को अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों के मुताबिक फैसले लेने की आजादी होनी चाहिए। यानी दुनिया के सभी देशों के लिए एआई को विकसित करने और इस्तेमाल करने का कोई एक ही मॉडल जरूरी नहीं है।
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एआई में तरक्की के साथ जोखिम भी
विदेश मंत्री ने एआई को ऐसी तकनीक बताया जो लोगों को सशक्त बना सकती है, आर्थिक विकास को गति दे सकती है और बड़े स्तर की समस्याओं से निपटने में मदद कर सकती है। उन्होंने फरवरी में भारत में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट का भी जिक्र किया। जयशंकर ने कहा कि भारत एआई को ग्लोबल साउथ के साथ अपनी साझेदारियों का हिस्सा बनाना चाहता है। हालांकि, उन्होंने एआई के गलत इस्तेमाल को लेकर चेतावनी भी दी। उनके मुताबिक, इसका दुरुपयोग पूर्वाग्रह को और गहरा कर सकता है और आपसी सम्मान को कमजोर कर सकता है। जिस तकनीक से कभी उम्मीदें जुड़ी थीं, वही अब चिंता का कारण भी बन रही है।
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दुनिया पर एक ही मॉडल थोपने के पक्ष में नहीं भारत
जयशंकर के बयान में राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को खास जगह मिली। उनका कहना था कि किसी देश को यह तय करने की आजादी होनी चाहिए कि वह कौन-से एआई मॉडल विकसित करना चाहता है और उन्हें किस तरह इस्तेमाल करेगा। यानी एआई के क्षेत्र में सभी देशों को एक ही रास्ते पर चलने के बजाय अपनी जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए।
एआई से आगे, बदलती दुनिया की भी बात
जयशंकर ने एआई पर अपनी बात को दुनिया में हो रहे बड़े बदलावों से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि तकनीक तेजी से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है, ऐसे में दूसरे देशों के हितों और विचारों का सम्मान करना जरूरी है। उनके मुताबिक, इससे शांति की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। उन्होंने देशों से एक-दूसरे की संस्कृति, विरासत और परंपराओं को भी ज्यादा महत्व देने की अपील की। जयशंकर ने कहा कि आर्थिक ताकत का संतुलन बदल रहा है और राजनीतिक बदलाव भी साफ दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में सांस्कृतिक बदलाव भी उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
‘दुनिया अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है’
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा, “हम अब बहुध्रुवीय दुनिया की ओर काफी आगे बढ़ चुके हैं।” उनके मुताबिक, 1945 के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब नई वास्तविकताओं के सामने बदल रही है। इन बदलावों के साथ तालमेल बैठाना आसान नहीं होगा। मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल के पीछे एक कारण यह भी है कि ज्यादा विविध और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को जगह कैसे दी जाए।
शांति के लिए बातचीत और पारदर्शिता जरूरी
विदेश मंत्री ने कहा कि स्थायी शांति के लिए देशों के बीच सभ्य संवाद, व्यापक विचार-विमर्श और पारदर्शी फैसले जरूरी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्रक्रिया से दुनिया की बड़ी आबादी को बाहर नहीं रखा जा सकता।
बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग फिर उठी
जयशंकर ने बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव की मांग पहले से ज्यादा मजबूत हो रही है। हालांकि, दिए गए भाषण में उन्होंने सुधार को लेकर कोई खास प्रस्ताव पेश नहीं किया। उनका तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में आज की दुनिया की वास्तविक तस्वीर दिखाई देनी चाहिए। यानी वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में बदलती आर्थिक और राजनीतिक ताकतों के साथ ज्यादा देशों की भागीदारी होनी चाहिए।
गुटेरेस और मिशन लाइफ का भी जिक्र
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के काम की सराहना की। उन्होंने खास तौर पर भारत की मिशन लाइफ पहल के लिए गुटेरेस के समर्थन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देशों के प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र महासभा की आम बहस से शांति, विकास और समृद्धि के प्रति और मजबूत प्रतिबद्धता के साथ लौटना चाहिए।
शांति सिर्फ समझौता नहीं, सोच भी होनी चाहिए
जयशंकर ने कहा कि शांति को केवल किसी समझौते के जरिए लागू या बातचीत के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए शांति को सोच और जीवन के तरीके का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने अपने भाषण का समापन महात्मा गांधी के शब्दों के साथ किया, 'शांति तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। शांति ही रास्ता है।'
यूएनएससी में सुधार की पुरानी मांग भी जुड़ी है इस रुख से
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी यूएनएससी में सुधार और स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय से ही यह दर्जा हासिल है।
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जनरल डिबेट में देशों की प्राथमिकताएं सामने आती हैं
संयुक्त राष्ट्र महासभा की जनरल डिबेट हर साल होने वाली वह अहम बैठक है, जिसमें सदस्य देश दुनिया के सामने अपनी प्राथमिकताएं और नीतिगत रुख रखते हैं। इस साल जयशंकर के भाषण में एआई पर भारत के नजरिए को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा समावेशिता की उसकी व्यापक मांग से जोड़कर पेश किया गया।