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एमपी: चंबल में अब डकैत नहीं, फिर भी 45 साल पुराना कानून लागू; पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

Thu, 03 Sep 2026 06:50 PM IST
भिन्ड ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भिंड
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भिंड Published by: भिन्ड ब्यूरो Updated Thu, 03 Sep 2026 06:50 PM IST
The dacoits are gone from Chambal, but the law remains—45-year-old Act challenged in High Court.

कभी चंबल का नाम आते ही बीहड़, बंदूक और डकैतों की तस्वीर सामने आती थी। दस्यु गिरोहों का खौफ चंबल की पहचान बन चुका था। हालांकि समय के साथ हालात बदले और चंबल की तस्वीर भी बदल गई। प्रदेश सरकार के मुताबिक, मध्यप्रदेश में वर्तमान में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। इसके बावजूद डकैत प्रभावित क्षेत्रों के लिए करीब 45 साल पहले बनाया गया मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 आज भी लागू है।

अब इसी कानून की संवैधानिक वैधता को ग्वालियर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। लहार के पूर्व विधायक, पूर्व नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. गोविंद सिंह ने इस संबंध में जनहित याचिका दायर की है।

याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब प्रदेश सरकार खुद विधानसभा में यह स्वीकार कर चुकी है कि राज्य में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो फिर डकैत प्रभावित क्षेत्रों की परिस्थितियों से निपटने के लिए बनाया गया विशेष कानून अब भी क्यों लागू है।

पढ़ें: चित्रकूट में बाढ़ के बाद राहत कार्य तेज, घर-घर पहुंच रहे कलेक्टर और एसपी, प्रभावितों को दिलाया भरोसा

डॉ. गोविंद सिंह का तर्क है कि वर्ष 1981 में जब यह कानून बनाया गया था, उस समय चंबल और आसपास के इलाकों में सक्रिय दस्यु गिरोह कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती थे। अपहरण, डकैती और फिरौती जैसी घटनाओं से निपटने के लिए कठोर कानूनी प्रावधानों की जरूरत महसूस की गई थी। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और पहले जैसी दस्यु गतिविधियां नहीं हैं।

जनहित याचिका में कानून की धारा 11 और 13 के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सामान्य आपराधिक मामलों में भी इन कठोर धाराओं का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे आम नागरिकों को विशेष कानून के सख्त प्रावधानों का सामना करना पड़ता है।

याचिका में इस कानून को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से भी जोड़ा गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून का मौजूदा स्वरूप नागरिकों के समानता के अधिकार और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में बदली परिस्थितियों में इस कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा जरूरी है।

हालांकि सरकार का पक्ष अलग है। विधानसभा में सरकार यह तर्क दे चुकी है कि भले ही प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय न हो, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में दूसरे राज्यों से आने वाले या असूचीबद्ध गिरोहों की संभावित गतिविधियों की आशंका बनी हुई है। चंबल सहित कई क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार इस कानून को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं है।

इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई विशेष न्यायालय में होती है। इसमें न्यूनतम तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान बताया गया है। साथ ही ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होने और जमानत के लिए हाईकोर्ट की शरण लेने जैसी कानूनी प्रक्रिया को भी याचिका में चुनौती के आधार के रूप में उठाया गया है।

याचिका पर होने वाली सुनवाई से न केवल इस करीब 45 साल पुराने कानून के भविष्य पर स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि चंबल के बदले हुए सामाजिक और आपराधिक परिदृश्य को लेकर भी एक नई कानूनी बहस शुरू हो गई है।

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