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Rishikesh News: दून की जमीन में कार्बन का स्तर 0.7 प्रतिशत से घटकर 0.4 प्रतिशत हुआ
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जौलीग्रांट। अपर जौलीग्रांट वार्ड संख्या पांच में किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में किसानों ने खेती से जुड़ी समस्याएं रखीं। गन्ना शोध संस्थान, काशीपुर से पहुंचे कृषि वैज्ञानिक सिद्धार्थ कश्यप ने कहा कि रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से कृषि भूमि की उर्वरक क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने बताया कि देहरादून क्षेत्र की कृषि भूमि में कार्बन का स्तर पिछले 30 वर्षों में 0.7 प्रतिशत से घटकर 0.4 प्रतिशत रह गया है, जो चिंता का विषय है। सिद्धार्थ कश्यप ने किसानों को रासायनिक खादों की जगह गोबर और जैविक खाद का इस्तेमाल करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जैविक खाद से मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और मिट्टी में कार्बन का स्तर भी बढ़ता है
उन्होंने गन्ने के बीज उपचार पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि पहले चीनी मिलों की ओर से किसानों को गर्म जल से उपचारित गन्ने के टुकड़ों (कैट्स या सेट्ठ) को बतौर बीज उपलब्ध कराया जाता था। बीज को करीब 52 डिग्री तापमान पर उपचारित किया जाता था। पुराने समय में किसान गन्ने को बुझी हुई चूने की घोल में करीब 24 घंटे तक डुबोकर रखने के बाद बुआई करते थे। इससे गन्ने में रोग लगने की संभावना कम होती थी और एक बार बोई गई फसल कई वर्षों तक उत्पादन देती थी। इससे किसानों को हर साल बुआई का खर्च नहीं उठाना पड़ता था। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई किसान बिना बीज उपचार के गन्ने की बुआई कर रहे हैं। इससे फसल में जल्द रोग और बीमारियां लगने की संभावना बढ़ जाती है। ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक गजेंद्र सिंह रावत ने किसानों को गन्ने की 18022 और 15023 तथा गेहूं की 187 और 302 प्रजातियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ये प्रजातियां अधिक उत्पादन देने वाली हैं। किसानों को बुआई से पहले मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए और जांच के आधार पर ही फसल की बुआई करनी चाहिए। किसान रघुवीर सिंह पुंडीर ने कहा कि जब से गन्ना विभाग और चीनी मिल की ओर से किसानों को उन्नत प्रजातियों के गन्ने की बुआई के लिए प्रोत्साहित किया गया है, तब से गन्ने की फसल केवल एक वर्ष ही उत्पादन दे रही है। दूसरे वर्ष किसानों को दोबारा गन्ने की बुआई करनी पड़ रही है। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस अवसर पर गन्ना पर्यवेक्षक रामकृष्ण नौटियाल, सुनील चंद्र सेमवाल, राकेश डोभाल, आदेश शर्मा, सूरज शर्मा, गंभीर सिंह, राजपाल सिंह, कमल किशोर शर्मा, पवन शर्मा आदि उपस्थित रहे।
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उन्होंने गन्ने के बीज उपचार पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि पहले चीनी मिलों की ओर से किसानों को गर्म जल से उपचारित गन्ने के टुकड़ों (कैट्स या सेट्ठ) को बतौर बीज उपलब्ध कराया जाता था। बीज को करीब 52 डिग्री तापमान पर उपचारित किया जाता था। पुराने समय में किसान गन्ने को बुझी हुई चूने की घोल में करीब 24 घंटे तक डुबोकर रखने के बाद बुआई करते थे। इससे गन्ने में रोग लगने की संभावना कम होती थी और एक बार बोई गई फसल कई वर्षों तक उत्पादन देती थी। इससे किसानों को हर साल बुआई का खर्च नहीं उठाना पड़ता था। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई किसान बिना बीज उपचार के गन्ने की बुआई कर रहे हैं। इससे फसल में जल्द रोग और बीमारियां लगने की संभावना बढ़ जाती है। ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक गजेंद्र सिंह रावत ने किसानों को गन्ने की 18022 और 15023 तथा गेहूं की 187 और 302 प्रजातियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ये प्रजातियां अधिक उत्पादन देने वाली हैं। किसानों को बुआई से पहले मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए और जांच के आधार पर ही फसल की बुआई करनी चाहिए। किसान रघुवीर सिंह पुंडीर ने कहा कि जब से गन्ना विभाग और चीनी मिल की ओर से किसानों को उन्नत प्रजातियों के गन्ने की बुआई के लिए प्रोत्साहित किया गया है, तब से गन्ने की फसल केवल एक वर्ष ही उत्पादन दे रही है। दूसरे वर्ष किसानों को दोबारा गन्ने की बुआई करनी पड़ रही है। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस अवसर पर गन्ना पर्यवेक्षक रामकृष्ण नौटियाल, सुनील चंद्र सेमवाल, राकेश डोभाल, आदेश शर्मा, सूरज शर्मा, गंभीर सिंह, राजपाल सिंह, कमल किशोर शर्मा, पवन शर्मा आदि उपस्थित रहे।
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