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Raebareli News: बारिश का भी नहीं असर, 22 सड़कों पर फर्राटा भर रहे लोग
Tue, 08 Sep 2026 01:26 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
Updated Tue, 08 Sep 2026 01:26 AM IST
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शिवगढ़ क्षेत्र के भवानीगढ़ चौराहा के पास बदहाल सड़क।
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रायबरेली। बारिश में हर साल सड़कें ध्वस्त हो जाती हैं। कई सड़कों की दशा तालाब जैसी हो जाती है। ऐसे में लोगों को आने-जाने में परेशानी झेलनी पड़ती है। ग्रामीण अभियंत्रण विभाग की ओर से फुल डेप्थ रिक्लेमेशन (एफडीआर) तकनीक से पांच साल पहले बनाई गई सड़कों पर लोग अब भी फर्राटा भर रहे हैं। इस तकनीक से बनाई जाने वाली सड़कों में लागत कम लगती है। पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता है।
जिले में 22 सड़कों को चिह्नित किया गया था। इनमें कोई सड़क 15 तो कोई 10 साल से खराब थी। वर्ष 2021 में इन सड़कों को बनाने की जिम्मेदारी ग्रामीण अभियंत्रण विभाग को मिली थी। करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार सड़कों पर लोग अब भी सफर कर रहे हैं।
क्या है एफडीआर तकनीक
यह एक आधुनिक एवं क्रांतिकारी तकनीक है, जिसमें पुरानी और क्षतिग्रस्त सड़क की डामर परत तथा उसके नीचे की बेस सामग्री को एक निश्चित गहराई तक एक साथ पीसकर मिलाया जाता है। इस पिसे हुए मिश्रण में सीमेंट, पानी को मिलाकर एक मजबूत और टिकाऊ लेयर तैयार की जाती है। इसके ऊपर नई डामर की परत बिछाई जाती है।
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पारंपरिक तरीकों की तुलना में इसमें पुरानी सामग्री को हटाने और नई गिट्टी लाने की जरूरत नहीं होती, जिससे लागत और समय दोनों कम लगते हैं। इस तकनीक से बनी सड़कें अधिक मजबूत होती हैं और बरसात या भारी ट्रैफिक में भी जल्दी उखड़ती नहीं हैं। इसके साथ निर्माण सामग्री का ज्यादा परिवहन नहीं करना पड़ता है। इससे पर्यावरण भी कम दूषित होता है।
बड़ी कंपनियों को मिलता मौका
इस तकनीक से बनाई जाने वाली सड़कों के लिए बड़ी मशीनों की जरूरत है। यह मशीनें ज्यादातर ठेकेदारों के पास नहीं है। यही वजह है कि छोटे ठेकेदार इस तकनीक से बनने वाली सड़कों का काम लेने से कतराते हैं। बड़ी कंपनियों के पास हाईटेक मशीनें होने के कारण उन्हें ही इस तरह के काम करने का मौका मिलता है।
पांच साल में होती है मरम्मत
एफडीआर तकनीक से बनाई जानी वाली सड़कें जल्दी नहीं टूटती हैं। पांच साल बाद अनुरक्षण होने के बाद फिर कई सालों तक सड़कों पर आसानी से सफर किया जा सकता है। इस तकनीक से बनाई जाने वाली सड़कों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि बारिश का पानी सड़कों पर न रुकने पाए।
- सुजीत कुमार राय, अधिशासी अभियंता ग्रामीण अभियंत्रण विभाग
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जिले में 22 सड़कों को चिह्नित किया गया था। इनमें कोई सड़क 15 तो कोई 10 साल से खराब थी। वर्ष 2021 में इन सड़कों को बनाने की जिम्मेदारी ग्रामीण अभियंत्रण विभाग को मिली थी। करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार सड़कों पर लोग अब भी सफर कर रहे हैं।
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क्या है एफडीआर तकनीक
यह एक आधुनिक एवं क्रांतिकारी तकनीक है, जिसमें पुरानी और क्षतिग्रस्त सड़क की डामर परत तथा उसके नीचे की बेस सामग्री को एक निश्चित गहराई तक एक साथ पीसकर मिलाया जाता है। इस पिसे हुए मिश्रण में सीमेंट, पानी को मिलाकर एक मजबूत और टिकाऊ लेयर तैयार की जाती है। इसके ऊपर नई डामर की परत बिछाई जाती है।
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पारंपरिक तरीकों की तुलना में इसमें पुरानी सामग्री को हटाने और नई गिट्टी लाने की जरूरत नहीं होती, जिससे लागत और समय दोनों कम लगते हैं। इस तकनीक से बनी सड़कें अधिक मजबूत होती हैं और बरसात या भारी ट्रैफिक में भी जल्दी उखड़ती नहीं हैं। इसके साथ निर्माण सामग्री का ज्यादा परिवहन नहीं करना पड़ता है। इससे पर्यावरण भी कम दूषित होता है।
बड़ी कंपनियों को मिलता मौका
इस तकनीक से बनाई जाने वाली सड़कों के लिए बड़ी मशीनों की जरूरत है। यह मशीनें ज्यादातर ठेकेदारों के पास नहीं है। यही वजह है कि छोटे ठेकेदार इस तकनीक से बनने वाली सड़कों का काम लेने से कतराते हैं। बड़ी कंपनियों के पास हाईटेक मशीनें होने के कारण उन्हें ही इस तरह के काम करने का मौका मिलता है।
पांच साल में होती है मरम्मत
एफडीआर तकनीक से बनाई जानी वाली सड़कें जल्दी नहीं टूटती हैं। पांच साल बाद अनुरक्षण होने के बाद फिर कई सालों तक सड़कों पर आसानी से सफर किया जा सकता है। इस तकनीक से बनाई जाने वाली सड़कों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि बारिश का पानी सड़कों पर न रुकने पाए।
- सुजीत कुमार राय, अधिशासी अभियंता ग्रामीण अभियंत्रण विभाग