हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पैरा शिक्षकों के नियमितीकरण पर राज्य सरकार की अंतरिम रोक अर्जी खारिज
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वित्तीय संकट का हवाला देकर सरकार अपने रुख से पीछे नहीं हट सकती। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर की गई शीघ्र सुनवाई और स्थगन की अर्जी को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पैरा शिक्षकों के नियमितीकरण मामले में राज्य सरकार की अंतरिम रोक की अर्जी को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वित्तीय संकट का हवाला देकर सरकार अपने रुख से पीछे नहीं हट सकती। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर की गई शीघ्र सुनवाई और स्थगन की अर्जी को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है। उल्लेखनीय है कि एकल न्यायाधीश ने राज्य सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें शिक्षकों को 20 अगस्त 2020 से नियमित करने की बात कही गई थी।
इसके साथ ही सरकार को आदेश दिया था कि पैरा शिक्षकों को पूर्व तिथि यानी 8 दिसंबर 2014 से नियमित किया जाए। इसी फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने डबल बेंच के समक्ष अपील दायर की है। शिक्षकों का कहना है कि इसी श्रेणी के अन्य शिक्षकों, जैसे ग्राम विद्या उपासक को 8 से 10 साल की सेवा पूरी करने पर नियमितीकरण का लाभ दिया गया है। चूंकि इन श्रेणियों का आपस में विलय हो चुका है, इसलिए सरकार इनके साथ अलग व्यवहार नहीं कर सकती।
खंडपीठ ने कहा कि पूर्व में हुए मुकदमों में भी राज्य सरकार ने नियमितीकरण का समर्थन किया था। ऐसे में सरकार सिर्फ वित्तीय दिक्कतों का बहाना बनाकर अब नया स्टैंड नहीं ले सकती।चूंकि मुख्य अपील को पहले ही सुनवाई के लिए स्वीकार किया जा चुका है और अब इसकी नियमित सुनवाई तय समय पर होगी। तब तक के लिए पिछला आदेश ही प्रभावी रहेगा।
मानहानि का केस शुरुआत में ही खारिज नहीं हो सकता: हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने मानहानि मामले में केशव दत्त श्रीधर और प्रतिवादी निशांत शर्मा के बीच चल रहे कानूनी विवाद में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने श्रीधर की उस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मानहानि के मुकदमे को शुरुआती दौर में बिना सुनवाई के ही रद्द करने की मांग की थी। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि शुरुआती अर्जी में कानूनी कार्रवाई का ठोस कारण दिख रहा है तो मुकदमा खारिज नहीं किया जा सकता। श्रीधर का आरोप है कि 9 अक्तूबर 2023 को भेजी एक झूठी और भ्रामक ई-मेल से उनकी सामाजिक और पेशेवर साख को नुकसान पहुंचा।
यह ईमेल उनके जूनियर वकीलों, पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों तक पहुंची। कोर्ट ने माना कि इन तथ्यों से मुकदमे का सीधा कारण बनता है। हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के पास मुकदमे को शुरुआत में ही रद्द करने की असाधारण शक्ति (ऑर्डर 7 रूल 11) होती है, लेकिन इसका उपयोग बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केस रद्द करने की अर्जी तय करते समय केवल वादी के दावों और दस्तावेजों को देखा जाता है। विरोधी पक्ष की दलीलों या लिखित जवाब पर इस चरण में विचार नहीं किया जाता। अदालत ने कहा कि वादी मुकदमे में सफल होगा या नहीं, यह सबूतों और सुनवाई के बाद तय होगा। इसे शुरुआत में ही खारिज कर देना सही नहीं होगा।