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नवरात्रि का तीसरा दिन: जानें मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, आरती और पौराणिक कथा

Mon, 12 Oct 2026 03:09 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Mon, 12 Oct 2026 03:09 PM IST
सार

 मां चंद्रघंटा पूजा विधि, मंत्र, भोग: नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। मां की पूजा करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। आइए जानते हैं नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, प्रिय भोग, मंत्र, आरती और उनकी पौराणिक कथा।

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Navratri Third Day Maa Chandraghanta Puja Vidhi Mantra Bhog Aarti Katha
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, आरती और कथा - फोटो : AI

नवरात्रि तीसरा दिन 2026: शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी का यह रूप साहस, शक्ति, शांति और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। मां चंद्रघंटा अपने भक्तों को भय से मुक्ति दिलाने और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। उनका स्वरूप जहां दुष्टों के लिए कठोर है, वहीं भक्तों के प्रति करुणा और ममता से भरा हुआ है। मान्यता है कि विधि-विधान से मां की पूजा करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। आइए जानते हैं नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, प्रिय भोग, मंत्र, आरती और उनकी पौराणिक कथा।



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Navratri Third Day Maa Chandraghanta Puja Vidhi Mantra Bhog Aarti Katha
मां चंद्रघंटा का स्वरूप - फोटो : Amar Ujala

मां चंद्रघंटा का स्वरूप और धार्मिक महत्व
मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप का नाम उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र के कारण पड़ा है। उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान रहता है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। देवी का वाहन सिंह माना जाता है, जो उनकी शक्ति, पराक्रम और निर्भयता को दर्शाता है। उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और पूजन सामग्री सुशोभित हैं। इनमें त्रिशूल, तलवार, गदा, धनुष-बाण, कमल और कमंडल जैसे प्रतीक शामिल हैं। उनका दिव्य स्वरूप अधर्म के विरुद्ध संघर्ष और धर्म की स्थापना का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां चंद्रघंटा की उपासना से मन का भय दूर करने, साहस बढ़ाने और मानसिक शांति प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।

Navratri Third Day Maa Chandraghanta Puja Vidhi Mantra Bhog Aarti Katha
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि - फोटो : Amar Ujala

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

  • नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 
  • इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां दुर्गा और मां चंद्रघंटा का ध्यान करें। 
  • पूजा की शुरुआत दीपक जलाकर और संकल्प लेकर की जा सकती है।
  • मां को लाल या पीले फूल अर्पित करें।
  • कुमकुम, अक्षत, धूप और दीप से विधिपूर्वक पूजन करें।
  • देवी को फल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग चढ़ाएं।
  • मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
  • अंत में देवी की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा कल्याण की प्रार्थना करें।
  • पूजा करते समय मन को शांत रखें और श्रद्धापूर्वक देवी का स्मरण करें। 

 

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मां चंद्रघंटा का प्रिय भोग - फोटो : Amar Ujala

मां चंद्रघंटा का प्रिय भोग
धार्मिक परंपराओं में मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बने पकवान अर्पित करने की मान्यता है। इस दिन देवी को खीर का भोग लगाया जा सकता है। केसर, इलायची और मेवों से तैयार खीर भी प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। इसके अतिरिक्त दूध से बनी मिठाइयां और मौसमी फल अर्पित कर सकते हैं। भोग तैयार करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें और प्रसाद को परिवार तथा अन्य भक्तों में बांटें। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक भोग अर्पित करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है।
 

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मां चंद्रघंटा की व्रत कथा - फोटो : Amar Ujala

मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने स्वर्गलोक पर अधिकार करने का प्रयास किया, जिससे सभी देवता चिंतित हो उठे। असुर के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी।

देवताओं की पीड़ा सुनकर त्रिदेवों सहित अन्य देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी का प्राकट्य हुआ। सभी देवताओं ने देवी को अपनी शक्तियों के अनुरूप अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और इंद्रदेव ने घंटा दिया। अन्य देवताओं ने भी उन्हें दिव्य शक्तियां प्रदान कीं।

अनेक अस्त्रों और दिव्य तेज से संपन्न देवी ने महिषासुर को युद्ध के लिए चुनौती दी। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः देवी ने महिषासुर का अंत करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। इस कथा के माध्यम से देवी के पराक्रम, धर्म की रक्षा और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश मिलता है।
 

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