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जबलपुर: 21 लाख की फीस प्रतिपूर्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, केंद्र और राज्य सरकार से मांगा गया जवाब

Tue, 01 Sep 2026 08:47 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Tue, 01 Sep 2026 08:47 PM IST
सार

पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप की पूरी राशि नहीं मिलने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला। याचिकाकर्ता ने तीन साल की करीब 21 लाख रुपये फीस प्रतिपूर्ति की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, मध्य प्रदेश सरकार और पिछड़ा वर्ग आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

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The state government is not providing post-matric scholarships to students who are natives of the state
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना की राशि मध्य प्रदेश के मूल निवासी छात्रों को पूरी तरह नहीं दिए जाने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार सहित राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के आयुक्त को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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याचिकाकर्ता डॉ. दिनेश चंद्र पाटीदार की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014-15 में ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के मेडिकल विद्यार्थियों के लिए पोस्ट-ग्रेजुएशन स्तर पर पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना शुरू की थी। योजना के तहत प्रदेश के मूल निवासी छात्र देश के किसी भी राज्य में पढ़ाई कर सकते हैं और पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स के तीन वर्षों की फीस दिए जाने का प्रावधान है। यह राशि केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार के माध्यम से संबंधित छात्रों को उपलब्ध कराई जानी है।

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याचिका में बताया गया कि याचिकाकर्ता ने ओबीसी वर्ग के विद्यार्थी के रूप में मध्य प्रदेश से बीडीएस की पढ़ाई की थी। इसके बाद उन्होंने हरियाणा के अंबाला स्थित मेडिकल कॉलेज में पीजी मेडिकल कोर्स में प्रवेश लिया। यहां उन्हें हर साल करीब सात लाख रुपये फीस जमा करनी पड़ी। केंद्र सरकार की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना का लाभ लेने के लिए उन्होंने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के आयुक्त से अनुरोध किया। इसके बाद उन्हें प्रति वर्ष 42 हजार रुपये के हिसाब से दो वर्षों में कुल 84 हजार रुपये की राशि दी गई। इस राशि को लेकर याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन वहां से याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट आदित्य सांघी ने तर्क दिया कि एक होनहार और आर्थिक रूप से कमजोर छात्र से प्रवेश के समय केंद्र सरकार की ओर से पूरी फीस वापस किए जाने का वादा किया गया था। ऐसे में राज्य सरकार को तीन वर्षों की करीब 21 लाख रुपये की फीस का भुगतान करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को छात्रवृत्ति की राशि में कटौती करने का अधिकार नहीं है। राज्य सरकार की भूमिका केवल केंद्र सरकार की योजना को लागू करने की है। फंड की कमी का हवाला देकर छात्रों को मिलने वाली फीस प्रतिपूर्ति में कटौती नहीं की जा सकती। ऐसा करना छात्रों के साथ किए गए वादे को तोड़ने जैसा है।

याचिका में यह भी कहा गया कि पूरी फीस की प्रतिपूर्ति नहीं होने से छात्रों को कोर्स पूरा करने के लिए बैंक से कर्ज लेना पड़ता है या आर्थिक संकट के कारण पढ़ाई छोड़ने की स्थिति बन जाती है। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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