प्यार वालों,
से दिल्लगी नहीं की जाती...
प्यास वालों,
से बंदगी नहीं की जाती...
हम अब
दूसरे किस्म के हैं :(
बे-एहसास सी
हर नब्ज़ है
आंखें...
बदन का गदरापन देखें :(
बहसें...
जीवन का खुरदुरापन याद कराए
ना, हुज़ूर ख़ुदा थे...
हां,
वजूद मिटा गए...
क्या सबूत
हम छुपा रहे?
अजब गुत्थी है...
क्यों नहीं सुलझती है?
क्यों लौ बुझ बुझ जाती है?
क्यों नींद, हवस की गुलामी है
विश्वास मैं
ख़ुद पे तो कर लूं?
एक कतरा...
अपनी जीत के लिए तो बचा लूं?
-राहुल
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