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रांची: आदिवासी एकता महाजुटान से गरमाई झारखंड की सियासत, कांग्रेस के शक्ति प्रदर्शन पर उठे सवाल

Tue, 01 Sep 2026 12:15 PM IST
राँची ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: राँची ब्यूरो Updated Tue, 01 Sep 2026 12:15 PM IST
सार

रांची के मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त को आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। रैली में कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं की मौजूदगी और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की की सक्रिय भूमिका से इसे लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।

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The big question following the massive tribal unity rally: Who will reap the political benefits?
रांची के मोरहाबादी मैदान में आदिवासी एकता महारैली, फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त को आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान रैली ने झारखंड की सियासत को एक बार फिर आदिवासी अधिकार, नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे के केंद्र में ला दिया है। रैली में आदिवासी समाज के बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी से आयोजक कांग्रेस के नेता उत्साहित नजर आए। मंच पर कांग्रेस के कई प्रमुख नेता मौजूद रहे, जबकि झामुमो की ओर से तमाड़ विधायक विकास मुंडा ने प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम के आयोजन में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने भी मंच से रैली के आयोजन के लिए बंधु तिर्की को धन्यवाद दिया।

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हालांकि, रैली के बाद इसकी राजनीतिक पहचान को लेकर विवाद भी शुरू हो गया है। भाजपा और कुछ आदिवासी संगठनों ने इसे आदिवासी एकता महाजुटान के बजाय कांग्रेस का राजनीतिक कार्यक्रम बताया है। विपक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि रैली में बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासी शामिल हुए और ग्रामीण इलाकों से लोगों को वाहनों के जरिए रांची लाया गया। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

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रैली को लेकर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस

रैली को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर झारखंड की राजनीति में विभाजन पैदा करने का आरोप लगाया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि परिसीमन जैसे मुद्दों के नाम पर आदिवासी समाज को भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि रैली का उद्देश्य आदिवासी अधिकारों, जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर समाज को एकजुट करना है। रैली में उमड़ी भीड़ के बाद अब इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। खासतौर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस इस जुटान को आगामी चुनावों में राजनीतिक लाभ में बदल पाएगी।

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28 विधानसभा सीटों पर आदिवासी वोट अहम

झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए 28 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। ऐसे में आदिवासी मतदाता राज्य की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धर्मांतरित आदिवासियों और सरना आदिवासियों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। इसी मुद्दे को लेकर भाजपा समेत कुछ संगठन कांग्रेस पर विशेष समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं।


आदिवासी समाज के बीच नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही इस बहस के बीच मोरहाबादी मैदान की रैली ने मुद्दे को और राजनीतिक बना दिया है। रैली में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी और झामुमो के विधायक की भागीदारी ने भी इसके राजनीतिक मायने को लेकर चर्चाओं को बढ़ा दिया है।

चुनाव में टिकट और वोटों के ध्रुवीकरण पर नजर

आगामी चुनावों में आदिवासी सीटों पर टिकट वितरण और वोटों के संभावित ध्रुवीकरण का असर बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि मोरहाबादी मैदान में हुए इस महाजुटान का प्रभाव चुनावी राजनीति में दिखाई देता है, तो कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है। वहीं, झामुमो और भाजपा के सामने आदिवासी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की चुनौती होगी।



फिलहाल, रैली ने झारखंड की राजनीति में आदिवासी नेतृत्व, अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि महाजुटान का असर केवल राजनीतिक मंच और नारों तक सीमित रहता है या आने वाले चुनावों में इसका वास्तविक प्रभाव भी दिखाई देता है।

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