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बांदीपोरा: मजहब की दीवारों से ऊपर भाईचारे की रोशनी, पीढ़ियों से दिवाली के दीये बना रहे मुस्लिम कुम्हार

Sun, 08 Nov 2026 12:34 PM IST
Nikita Gupta भट्ट शहजाद, अमर उजाला, नेटवर्क बांदीपोरा
भट्ट शहजाद, अमर उजाला, नेटवर्क बांदीपोरा Published by: Nikita Gupta Updated Sun, 08 Nov 2026 12:34 PM IST
सार

बांदीपोरा के अजर गांव में मुस्लिम कुम्हार परिवार पीढ़ियों से कश्मीरी पंडित पड़ोसियों के लिए दिवाली के मिट्टी के दीये बनाकर आपसी भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे हैं। घटते ऑर्डर और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद ये परिवार अपनी पुश्तैनी कला और इस अनूठी परंपरा को जिंदा रखने में जुटे हैं।
 

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Muslim potters who have been sharing the light of Diwali for generations
मुस्लिम कुम्हार - फोटो : संवाद

विस्तार

दिवाली का त्योहार आते ही देशभर में घर और आंगन दीयों की रोशनी से जगमगाने लगते हैं। जम्मू-कश्मीर के उत्तरी कश्मीर स्थित बांदीपोरा जिले के अजर गांव में भी इन दिनों कुछ परिवार मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं। खास बात यह है कि मुस्लिम कुम्हार परिवार पीढ़ियों से अपने कश्मीरी पंडित पड़ोसियों के लिए दिवाली पर दीये तैयार करते आ रहे हैं। यह परंपरा न सिर्फ उनके पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखे हुए है, बल्कि दोनों समुदायों के बीच आपसी प्रेम और भाईचारे की मिसाल भी पेश करती है।

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Muslim potters who have been sharing the light of Diwali for generations
मिट्टी के दीये - फोटो : संवाद

गांव में आज भी कुछ कश्मीरी पंडित परिवार रहते हैं। उनके दिवाली उत्सव को खास बनाने के लिए मुस्लिम कुम्हार परिवार हर साल मिट्टी के दीये तैयार करते हैं। इन्हीं कारीगरों में शामिल बशीर अहमद अपने परिवार के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए दीये बनाना महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों की खुशियों में शामिल होने और आपसी रिश्तों को मजबूत करने का एक तरीका भी है।

कम ऑर्डर के बावजूद नहीं टूटी परंपरा
बशीर अहमद बताते हैं कि पहले की तुलना में अब दीयों के ऑर्डर काफी कम मिलने लगे हैं। बांडीपोरा में दूसरे इलाकों के मुकाबले मांग भी सीमित है। इसके बावजूद उनका परिवार हर साल दिवाली से पहले मिट्टी के दीये तैयार करता है, ताकि कश्मीरी पंडित परिवारों को पारंपरिक दीये मिल सकें।

उन्होंने कहा कि दिवाली हमारे पंडित भाइयों का त्योहार है और उनकी खुशियों में शामिल होकर हमें खुशी मिलती है। हमारा परिवार कई पीढ़ियों से यह काम करता आ रहा है। भले ही अब ऑर्डर कम मिलते हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि यह परंपरा आगे भी जारी रहे।

मिट्टी के दीयों में झलकता है भाईचारा
दिवाली पर मिट्टी के दीये जलाना अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। अजर गांव में मुस्लिम कुम्हारों की ओर से तैयार किए जाने वाले ये दीये कश्मीरी पंडित परिवारों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मुस्लिम पड़ोसियों की ओर से पीढ़ियों से दीये तैयार करने की परंपरा आपसी सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाती है। यह इस बात की भी मिसाल है कि त्योहार और परंपराएं समुदायों के बीच रिश्तों को किस तरह मजबूत बनाती हैं।

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मिट्टी के दीये - फोटो : संवाद

बदलते बाजार से पुश्तैनी काम पर संकट
समय के साथ मिट्टी के बर्तनों और दीयों की मांग में कमी आई है। बदलती बाजार पसंद और सीमित ऑर्डर के कारण कुम्हार परिवारों के लिए इस पारंपरिक पेशे को आय का स्थायी साधन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। इसके बावजूद कारीगर हर साल दिवाली पर दीये बनाना नहीं छोड़ते। उनका प्रयास है कि आने वाली पीढ़ियां भी इस पुश्तैनी हुनर और भाईचारे की इस खूबसूरत परंपरा से जुड़ी रहें।

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