तेजी से जकड़ रहा है शरीर का दर्द: 55 से पहले महिलाओं में अधिक परेशानी; धूम्रपान, मोटापा और कम आय भी अहम कारक
55 से पहले ही शरीर का दर्द तेजी से जकड़ रहा है। महिलाओं में ज्यादा परेशान देखी जा रही है।धूम्रपान, मोटापा और कम आय भी अहम कारक के रूप में सामने आए हैं। 118 देशों के 61 लाख से अधिक लोगों के अध्ययन में कई अन्य खुलासे भी हुए हैं। बुजुर्गों में पीठ, कूल्हे और घुटनों के दर्द का बोझ सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है।
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आम धारणा है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर का दर्द लगातार बढ़ता जाता है, लेकिन दुनिया के 118 देशों में 61 लाख से अधिक लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन ने इस तस्वीर के कई पहलुओं को सामने रखा है। शोध के अनुसार शरीर के कई हिस्सों में दर्द 55 साल की उम्र से पहले सबसे तेजी से बढ़ता है। वहीं, महिलाओं में लगभग सभी प्रमुख शारीरिक हिस्सों के दर्द की व्यापकता पुरुषों से अधिक पाई गई। पीठ, कूल्हे और घुटनों का दर्द हालांकि उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता रहता है और 75 वर्ष या उससे अधिक उम्र में चरम पर पहुंच सकता है।
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि दर्द को केवल बुढ़ापे की समस्या मानना उचित नहीं है। इसकी रोकथाम के प्रयास युवावस्था और मध्य आयु से ही शुरू करने की जरूरत है।शोधकर्ताओं ने 118 देशों और क्षेत्रों में किए गए 902 जनसंख्या-आधारित अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इनमें 61 लाख 25 हजार 459 से अधिक लोग शामिल थे। प्रतिभागियों की उम्र पांच वर्ष से लेकर 100 वर्ष से अधिक तक थी। विश्लेषण में 1990 से 2025 के बीच किए गए अध्ययनों के आंकड़े शामिल किए गए।शोध में शरीर के 11 प्रमुख हिस्सों में दर्द की व्यापकता का आकलन किया गया। इनमें पीठ, कूल्हे, घुटने, गर्दन, कंधे, कोहनी, सिर, चेहरा और पेट सहित अन्य हिस्सों का दर्द शामिल था। अलग-अलग हिस्सों में दर्द की व्यापकता में बड़ा अंतर मिला। चेहरे का दर्द लगभग दो प्रतिशत लोगों में पाया गया, जबकि पीठ दर्द की व्यापकता करीब 40 प्रतिशत रही।
महिलाओं में चेहरे का दर्द 83 फीसदी अधिक
अध्ययन में सभी 11 प्रमुख शारीरिक हिस्सों में महिलाओं के बीच दर्द की व्यापकता पुरुषों से अधिक दर्ज की गई। महिलाओं में चेहरे के दर्द की व्यापकता पुरुषों के मुकाबले 83 प्रतिशत, सिरदर्द 74 प्रतिशत और पेट या उदर के दर्द की व्यापकता 60 प्रतिशत अधिक थी।यह अंतर बताता है कि दर्द का बोझ महिला और पुरुषों में समान नहीं है।हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर महिलाओं में दर्द अधिक होने का कोई एक निश्चित कारण नहीं बताया जा सकता। जैविक अंतर, जीवन की परिस्थितियां और अन्य जोखिम कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
हर तरह का दर्द उम्र के साथ नहीं बढ़ता
अध्ययन के मुताबिक, सिरदर्द, पेट, चेहरे, गर्दन, कंधे और कोहनी सहित सात प्रकार के दर्द की व्यापकता मध्य से अधिक उम्र के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचती है। इसके बाद इनमें गिरावट आने लगती है। इसके विपरीत पीठ, कूल्हे और घुटनों का दर्द बढ़ती उम्र के साथ अधिक आम होता जाता है और 75 वर्ष या उससे अधिक आयु में चरम पर पहुंच सकता है।शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द की समग्र व्यापकता पांच वर्ष की उम्र में करीब 30 प्रतिशत से बढ़कर 100 वर्ष या उससे अधिक उम्र में लगभग 70 प्रतिशत हो जाती है। तेज दर्द की व्यापकता करीब 50 वर्ष की उम्र के आसपास, जबकि शरीर के कई हिस्सों में फैले दर्द की व्यापकता लगभग 70 वर्ष की उम्र में चरम पर पहुंचती है।
कम विकसित देशों में बुजुर्गों पर ज्यादा बोझ
शोधकर्ताओं ने देशों की स्थिति की तुलना मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के आधार पर भी की। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे पहलुओं को शामिल किया जाता है। नतीजों के अनुसार, 40 वर्ष की उम्र के बाद कम एचडीआई वाले देशों में शरीर के किसी भी हिस्से, जोड़ों और पीठ के दर्द की व्यापकता अधिक तेजी से बढ़ी।80 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में कम एचडीआई वाले देशों में पीठ के निचले हिस्से के दर्द की व्यापकता उच्च एचडीआई वाले देशों की तुलना में लगभग दोगुनी पाई गई। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, कामकाज की परिस्थितियां और अन्य बीमारियां इस अंतर से जुड़ी हो सकती हैं, हालांकि अध्ययन इनके प्रभाव को निर्णायक रूप से साबित नहीं करता।
धूम्रपान, मोटापा और कम आय भी जोखिम से जुड़े
अध्ययन में धूम्रपान, मोटापे और कम घरेलू आय का संबंध शरीर के विभिन्न हिस्सों में दर्द की अधिक व्यापकता से पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, धूम्रपान, मोटापा और कम घरेलू आय दुनिया भर में शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाले दर्द के कुल मामलों में करीब 18 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
कम उम्र से बचाव पर जोर
यह अध्ययन दर्द की रोकथाम और स्वास्थ्य नीतियां तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है। इसके अनुसार बचाव के उपाय केवल बुजुर्गों तक सीमित रखने के बजाय युवावस्था और मध्य आयु से शुरू होने चाहिए। साथ ही शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द की प्रकृति और उससे जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखकर उपाय तय करना जरूरी है।इतने बड़े वैश्विक आंकड़ों के आधार पर किया गया यह विश्लेषण बताता है कि दर्द का बोझ उम्र, लिंग और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।