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Kaithal News: खेत से उद्योग तक पहुंचेगी पराली, ऊर्जा और पेलेट तैयार करने में होगी इस्तेमाल
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एक स्टॉक में रखी पराली। संवाद
कैथल। धान की कटाई के साथ जिले में निकलने वाली करीब 11 लाख मीट्रिक टन पराली इस बार ऊर्जा और उद्योग के लिए कच्चा माल बनेगी। इसके अलावा चारे के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। कृषि विभाग ने जिले में 4.40 लाख एकड़ में धान की खेती से निकलने वाले फसल अवशेष के प्रबंधन के लिए कार्ययोजना तैयार की है। योजना के तहत 4.30 लाख मीट्रिक टन अवशेष खेत में ही मिलाया जाएगा, जबकि 5.70 लाख टन पराली को खेतों से बाहर निकालकर उपयोग में लाया जाएगा। इसके लिए मशीनरी से लेकर औद्योगिक इकाइयों और पशु चारे तक की व्यवस्था को योजना में शामिल किया गया है। इसके अलावा एक लाख टन अवशेष पशु चारे के लिए इस्तेमाल करने की योजना है।
कृषि विभाग ने खेतों से बाहर निकाली जाने वाली 5.70 लाख मीट्रिक टन पराली के लिए जिले में खपत का नेटवर्क तैयार कर लिया है और 20 इकाइयों को पराली की खपत से जोड़ा है। इन इकाइयों की कुल वार्षिक उपयोग क्षमता 5.662 लाख मीट्रिक टन है और इनके पास करीब 4.50 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता उपलब्ध है। इन इकाइयों में छह बॉयलर, तीन बायोमास बिजली संयंत्र, छह पेलेट प्लांट, पांच एग्रीगेटर और पशु चारे से जुड़ी एक इकाई शामिल है। यहां पराली से ऊर्जा और पेलेट तैयार करने के साथ चारे के रूप में भी इसका उपयोग होगा। इस संबंध में कृषि उपमंडल अधिकारी सतीश नारा व सहायक कृषि अभियंता जगदीश मलिक ने कहा विभाग पूरी तरह से फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर तैयार है। किसानों से आह्वान है कि वे खेतों में आग न लगाएं। फसल अवशेष का प्रबंधन करें। संवाद
4050 मशीनें तैयार, 2.25 लाख एकड़ में गांठ बनाने की क्षमता
पराली प्रबंधन के लिए जिले में 4050 सीआरएम मशीनें उपलब्ध हैं। इनमें 3800 इन-सीटू और 250 एक्स-सीटू मशीनें शामिल हैं। उपलब्ध 250 स्ट्रॉ बेलर करीब 2.25 लाख एकड़ में पराली की गांठ बनाने में सक्षम हैं। एक्स-सीटू प्रबंधन को और मजबूत करने के लिए 150 अतिरिक्त स्ट्रॉ बेलर की जरूरत का आकलन किया गया है। प्रशासन की कोशिश है कि किसान को कटाई के समय गांव के नजदीक ही मशीनरी उपलब्ध हो, ताकि खेत में अवशेष मिलाने या गांठ बनाकर बाहर भेजने का विकल्प आसानी से मिल सके।
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272 गांवों में किसानों को बताया जा रहा समाधान
पराली प्रबंधन को लेकर जिले के 272 गांवों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। कस्टम हायरिंग सेंटर और हॉटस्पॉट गांवों में किसानों को मशीनों के इस्तेमाल और अवशेष प्रबंधन के तरीकों की जानकारी दी जा रही है। खेत में अवशेष मिलाने, गांठ तैयार करने और उसे उद्योगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया के बारे में भी किसानों को बताया जाएगा। अभियान में स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों को भी जोड़ा जाएगा, ताकि पराली प्रबंधन को लेकर गांवों में व्यापक जागरूकता पैदा हो।
इस बार गांव स्तर तक होगी निगरानी
पिछले वर्ष जिले में 72 स्थानों पर पराली जलाने की सूचना मिली थी। इस बार निगरानी व्यवस्था को गांव स्तर तक मजबूत किया गया है। गांवों को रेड और येलो जोन में चिह्नित किया गया है। जिला और उपमंडल स्तर पर टीमें मशीनरी की उपलब्धता और फसल अवशेष प्रबंधन की स्थिति पर नजर रखेंगी। जिला स्तर पर एसडीओ को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जबकि उपमंडल स्तर पर एसडीएम की अध्यक्षता में टीमें काम करेंगी। साथ ही पराली जलाने पर जुर्माने, एफआईआर और मेरी फसल-मेरा ब्यौरा में रेड एंट्री जैसी कार्रवाई का प्रावधान रखा है।
छह गांवों पर रहेगी विशेष नजर
पिछले वर्षों के आंकड़ों के आधार पर जिले के कुछ गांवों को पराली जलाने के मामले में संवेदनशील माना गया है। कार्ययोजना में देबवन, पबनावा, कैलरम, खरौदी, सीवन और थेह खरक समेत पांच गांवों को प्रमुखता से चिह्नित किया गया है। जिले में वर्ष 2023 में 62 रेड जोन गांव थे, जो 2024 में घटकर 46 और 2025 में 15 रह गए हैं। कैथल में बासमती, 1121, पीआर व मुच्छल किस्म की धान रोपाई हर वर्ष होती है।
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कृषि विभाग ने खेतों से बाहर निकाली जाने वाली 5.70 लाख मीट्रिक टन पराली के लिए जिले में खपत का नेटवर्क तैयार कर लिया है और 20 इकाइयों को पराली की खपत से जोड़ा है। इन इकाइयों की कुल वार्षिक उपयोग क्षमता 5.662 लाख मीट्रिक टन है और इनके पास करीब 4.50 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता उपलब्ध है। इन इकाइयों में छह बॉयलर, तीन बायोमास बिजली संयंत्र, छह पेलेट प्लांट, पांच एग्रीगेटर और पशु चारे से जुड़ी एक इकाई शामिल है। यहां पराली से ऊर्जा और पेलेट तैयार करने के साथ चारे के रूप में भी इसका उपयोग होगा। इस संबंध में कृषि उपमंडल अधिकारी सतीश नारा व सहायक कृषि अभियंता जगदीश मलिक ने कहा विभाग पूरी तरह से फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर तैयार है। किसानों से आह्वान है कि वे खेतों में आग न लगाएं। फसल अवशेष का प्रबंधन करें। संवाद
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4050 मशीनें तैयार, 2.25 लाख एकड़ में गांठ बनाने की क्षमता
पराली प्रबंधन के लिए जिले में 4050 सीआरएम मशीनें उपलब्ध हैं। इनमें 3800 इन-सीटू और 250 एक्स-सीटू मशीनें शामिल हैं। उपलब्ध 250 स्ट्रॉ बेलर करीब 2.25 लाख एकड़ में पराली की गांठ बनाने में सक्षम हैं। एक्स-सीटू प्रबंधन को और मजबूत करने के लिए 150 अतिरिक्त स्ट्रॉ बेलर की जरूरत का आकलन किया गया है। प्रशासन की कोशिश है कि किसान को कटाई के समय गांव के नजदीक ही मशीनरी उपलब्ध हो, ताकि खेत में अवशेष मिलाने या गांठ बनाकर बाहर भेजने का विकल्प आसानी से मिल सके।
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272 गांवों में किसानों को बताया जा रहा समाधान
पराली प्रबंधन को लेकर जिले के 272 गांवों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। कस्टम हायरिंग सेंटर और हॉटस्पॉट गांवों में किसानों को मशीनों के इस्तेमाल और अवशेष प्रबंधन के तरीकों की जानकारी दी जा रही है। खेत में अवशेष मिलाने, गांठ तैयार करने और उसे उद्योगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया के बारे में भी किसानों को बताया जाएगा। अभियान में स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों को भी जोड़ा जाएगा, ताकि पराली प्रबंधन को लेकर गांवों में व्यापक जागरूकता पैदा हो।
इस बार गांव स्तर तक होगी निगरानी
पिछले वर्ष जिले में 72 स्थानों पर पराली जलाने की सूचना मिली थी। इस बार निगरानी व्यवस्था को गांव स्तर तक मजबूत किया गया है। गांवों को रेड और येलो जोन में चिह्नित किया गया है। जिला और उपमंडल स्तर पर टीमें मशीनरी की उपलब्धता और फसल अवशेष प्रबंधन की स्थिति पर नजर रखेंगी। जिला स्तर पर एसडीओ को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जबकि उपमंडल स्तर पर एसडीएम की अध्यक्षता में टीमें काम करेंगी। साथ ही पराली जलाने पर जुर्माने, एफआईआर और मेरी फसल-मेरा ब्यौरा में रेड एंट्री जैसी कार्रवाई का प्रावधान रखा है।
छह गांवों पर रहेगी विशेष नजर
पिछले वर्षों के आंकड़ों के आधार पर जिले के कुछ गांवों को पराली जलाने के मामले में संवेदनशील माना गया है। कार्ययोजना में देबवन, पबनावा, कैलरम, खरौदी, सीवन और थेह खरक समेत पांच गांवों को प्रमुखता से चिह्नित किया गया है। जिले में वर्ष 2023 में 62 रेड जोन गांव थे, जो 2024 में घटकर 46 और 2025 में 15 रह गए हैं। कैथल में बासमती, 1121, पीआर व मुच्छल किस्म की धान रोपाई हर वर्ष होती है।