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नींद-झपकी बनी सबसे बड़ा खतरा: 14 साल में यमुना एक्सप्रेसवे पर 8812 हादसे, आरटीआई से चौंकाने वाले खुलासे
Thu, 24 Sep 2026 03:08 PM IST
अनुज कुमार
माई सिटी रिपोर्टर, ग्रेटर नोएडा
माई सिटी रिपोर्टर, ग्रेटर नोएडा
Published by: अनुज कुमार
Updated Thu, 24 Sep 2026 03:08 PM IST
सार
ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए दर्दनाक बस हादसे ने सिस्टम की नींद खोल दी। 14 साल में यमुना एक्सप्रेसवे पर 8812 हादसे हुए। वर्ष 2012 से 2025 के बीच एक्सप्रेसवे पर 8812 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, यानी औसतन हर दिन करीब दो हादसे हुए।
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यमुना एक्सप्रेसवे
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यमुना एक्सप्रेसवे पर फर्राटा भरते वाहनों के बीच चालकों की छोटी सी चूक जानलेवा साबित हो रही है। पिछले 14 वर्षों के आंकड़े इसकी भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। वर्ष 2012 से 2025 के बीच यमुना एक्सप्रेसवे पर 8812 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। यानी औसतन हर दिन करीब दो हादसे हुए। इनमें सबसे अधिक 3700 दुर्घटनाओं की वजह चालक को नींद या झपकी आना रही। वहीं ओवरस्पीडिंग के कारण 1319 और टायर फटने से 853 हादसे हुए।
आरटीआई के माध्यम से सामने आई जानकारी बताती है कि 165 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे पर हादसों के पीछे सड़क से अधिक मानवीय चूक बड़ी वजह बनकर सामने आई है। 14 वर्षों में हुई कुल दुर्घटनाओं में करीब 42 प्रतिशत हादसों में चालक को नींद या झपकी आने को प्रमुख कारण माना गया। इसके अलावा 22.7 प्रतिशत दुर्घटनाएं लापरवाही से हुईं, जबकि करीब 15 प्रतिशत हादसों के पीछे ओवरस्पीडिंग जिम्मेदार रही।
आंकड़े इसलिए भी चिंता बढ़ा रहे हैं क्योंकि हाल के वर्षों में हादसों की संख्या में तेजी आई है। वर्ष 2022 में 311 दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 659 तक पहुंच गई। यानी तीन वर्षों में दुर्घटनाओं की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई।
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25 हजार से अधिक ओवरलोड वाहन भी पकड़े
एक्सप्रेसवे पर ओवरलोड वाहनों की आवाजाही भी चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2025 में 25,731 ओवरलोड वाहन पकड़े गए। इसके बावजूद भारी वाहनों की आवाजाही जारी रहने से निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर हादसों के आंकड़े बताते हैं कि केवल बेहतर सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित सफर के लिए चालकों को नियमित अंतराल पर आराम, गति सीमा का पालन और यातायात नियमों के प्रति जागरूक करना जरूरी है। इसके साथ ही ओवरस्पीडिंग और ओवरलोडिंग पर प्रभावी निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।
हादसों की बड़ी वजह
नींद व झपकी — 3700 हादसे (करीब 42%)
ओवरस्पीडिंग — 1319 हादसे (करीब 15%)
टायर फटना — 853 हादसे
लापरवाही — 22.7 प्रतिशत मामले
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आरटीआई के माध्यम से सामने आई जानकारी बताती है कि 165 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे पर हादसों के पीछे सड़क से अधिक मानवीय चूक बड़ी वजह बनकर सामने आई है। 14 वर्षों में हुई कुल दुर्घटनाओं में करीब 42 प्रतिशत हादसों में चालक को नींद या झपकी आने को प्रमुख कारण माना गया। इसके अलावा 22.7 प्रतिशत दुर्घटनाएं लापरवाही से हुईं, जबकि करीब 15 प्रतिशत हादसों के पीछे ओवरस्पीडिंग जिम्मेदार रही।
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आंकड़े इसलिए भी चिंता बढ़ा रहे हैं क्योंकि हाल के वर्षों में हादसों की संख्या में तेजी आई है। वर्ष 2022 में 311 दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 659 तक पहुंच गई। यानी तीन वर्षों में दुर्घटनाओं की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई।
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25 हजार से अधिक ओवरलोड वाहन भी पकड़े
एक्सप्रेसवे पर ओवरलोड वाहनों की आवाजाही भी चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2025 में 25,731 ओवरलोड वाहन पकड़े गए। इसके बावजूद भारी वाहनों की आवाजाही जारी रहने से निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर हादसों के आंकड़े बताते हैं कि केवल बेहतर सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित सफर के लिए चालकों को नियमित अंतराल पर आराम, गति सीमा का पालन और यातायात नियमों के प्रति जागरूक करना जरूरी है। इसके साथ ही ओवरस्पीडिंग और ओवरलोडिंग पर प्रभावी निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।
हादसों की बड़ी वजह
नींद व झपकी — 3700 हादसे (करीब 42%)
ओवरस्पीडिंग — 1319 हादसे (करीब 15%)
टायर फटना — 853 हादसे
लापरवाही — 22.7 प्रतिशत मामले