लालकृष्ण आडवाणी: शताब्दी की ओर बढ़ती प्रेरणादायी यात्रा...भावुक पल; जो जिम्मेदारी मिली, पूरी निष्ठा से निभाया
एक सांसद के रूप में आडवाणी जी की यात्रा 1970 के दशक से शुरू हुई। संसद में उनकी सक्रिय भागीदारी की आज भी सराहना होती है। एक सांसद के रूप में, दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के रूप में और सत्ता पक्ष में रहते हुए भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
विस्तार
आज 8 नवंबर को लालकृष्ण आडवाणी जी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ये कितना सुखद संयोग है कि आज दीपावली का पावन पर्व भी है। प्रभु श्रीराम और दीपों के इस उत्सव के साथ आडवाणी जी के जीवन का इतना महत्वपूर्ण पड़ाव जुड़ना, इस अवसर को और भी यादगार बनाता है। इस संयोग को एक और बात विशेष बनाती है। इसी वर्ष हम जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मना रहे हैं। आज का अवसर मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भावुक कर देने वाला है। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे हमेशा आडवाणी जी का स्नेह, सान्निध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा है। आज उनके साथ बिताए अनगिनत पल, उनसे जुड़ी कितनी ही स्मृतियां मन में उमड़ रही हैं।
सार्वजनिक जीवन में काम करते हुए कई दशक पहले मुझे उनके संपर्क में आने का अवसर मिला था। धीरे-धीरे हमारा ये संबंध इतना आत्मीय हो गया कि वे मेरे लिए अभिभावक की तरह बन गए। उन्होंने मेरा हाथ थामकर मुझे राजनीति की बारीकियां सिखाईं, कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। जीवन में जब भी कोई कठिन परिस्थिति आई, उनका अनुभव और उनकी सीख मेरे लिए संबल बने। आज भी जब मैं उनसे मिलने जाता हूं, तो उनके साथ बिताया हुआ समय मुझे नई ऊर्जा और नई प्रेरणा से भर देता है। आज इस अवसर पर श्रद्धेय आडवाणी जी के लिए मन में एक ही भाव उमड़ रहा है...
“जीवेत शरदः शतं, पश्येम शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं।”
ऐसे व्यक्तित्व बहुत कम हैं, जिनके जीवन में आधुनिक भारत के इतिहास के इतने सारे अध्याय समाए हों। आडवाणी जी का जन्म 8 नवंबर, 1927 को देव दीपावली के दिन हुआ था। 1947 में, जब वे युवा थे, तब उन्हें विभाजन की पीड़ा सहनी पड़ी। सिंध में अपना घर, अपना परिवेश, अपनी जानी-पहचानी दुनिया छोड़कर उन्हें आना पड़ा। सब कुछ पीछे छूट गया और जीवन की नई शुरुआत शून्य से करनी पड़ी। लेकिन इस अनुभव को लेकर उनके मन में कभी कोई कड़वाहट या पछतावा नहीं रहा। कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, नए सिरे से कुछ खड़ा करने का उनका ये संकल्प जीवनभर उनके साथ रहा। जनसंघ को मजबूत बनाने और बाद में भारतीय जनता पार्टी के निर्माण में भी उनका यही गुण सामने आया।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में देश की राजनीति ने बड़े बदलाव देखे। 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से नीचे आ गईं। 1996 में भाजपा पहली बार देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। आडवाणी जी ने कार्यकर्ताओं की अनेक पीढ़ियों को तैयार किया। उन्होंने राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत पर पार्टी की मजबूत नींव रखी। यहां मैं उनके व्यक्तित्व की दो ऐसी विशेषताओं का उल्लेख करना चाहूंगा, जो एक नेता के रूप में उन्हें अलग पहचान देती हैं। पहली, उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता। उनके भाषणों और लेखन में इसकी झलक साफ दिखाई देती थी। जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने जो प्रस्ताव लिखे, वे आज भी पढ़ने और समझने योग्य हैं। दूसरी विशेषता थी, भारतीय राजनीति में लंबे समय तक हावी रही छद्म धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनका स्पष्ट और निर्भीक रुख। उन्होंने देश के राजनीतिक विमर्श में इस प्रवृत्ति की वास्तविकता को उजागर किया।
आडवाणी जी को जो जिम्मेदारी मिली, उन्होंने उसे पूरी निष्ठा से निभाया। संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने सबसे पहले राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया। इसके बाद वे दिल्ली आए, जहां उन्हें अटल जी के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला। इसके बाद की कहानी तो इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। दोनों ने दशकों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। आडवाणी जी के लिए अटल जी हमेशा नेता और मार्गदर्शक रहे। राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जब दो बड़े कद के नेता इतने लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हों। भारतीय राजनीति में आपसी विश्वास, सहयोग और समर्पण की ये परंपरा आज भी एक बड़ी प्रेरणा है।
Today, 8th November, is a landmark day. Respected L.K. Advani Ji enters his hundredth year. On this special occasion, my greetings to him. I’ve written an article in which I’ve highlighted his everlasting contribution to India. I have recalled his journey, be it experiencing the horrors of Partition and rebuilding life from scratch, strengthening the Jana Sangh and building the BJP, standing up for democracy during the Emergency, leading the Somnath to Ayodhya Rath Yatra or serving the nation in government. Have also written about other aspects of Advani Ji - the voracious reader, his love for culture and cinema, a prolific writer and more. English - https://t.co/tc77ZVhRdo हिंदी - https://t.co/t0JSavOopX
— Narendra Modi (@narendramodi) November 8, 2026
1991 के लोकसभा चुनाव की स्मृतियां आज भी मेरे मन में ताजा हैं। उस समय तय हुआ था कि आडवाणी जी दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगे। इनमें से एक सीट गांधीनगर की थी। उस समय मैं भाजपा के संगठन में काम कर रहा था। मुझे आडवाणी जी के नामांकन पत्र तैयार करने से लेकर पूरे चुनाव अभियान में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। गांधीनगर की जनता ने भी उन्हें बार-बार बड़े बहुमत से विजयी बनाकर संसद भेजा। मेरे लिए ये भी बहुत सौभाग्य की बात रही कि गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र का मतदाता होने के नाते मुझे अनेक बार आडवाणी जी को अपना वोट देने का अवसर मिला। अपने संसदीय क्षेत्र और वहां के लोगों के प्रति उनका लगाव और उनकी जरूरतों का ध्यान रखने का उनका भाव, हम सभी के लिए सीखने योग्य है।
आपातकाल आडवाणी जी के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। वह लोकतंत्र को बचाने और संविधान की रक्षा के संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। आपातकाल के दौरान उन्होंने जो कुछ देखा, अनुभव किया और महसूस किया, उसकी झलक उनकी पुस्तक ‘A Prisoner's Scrap-Book’ में भी मिलती है। 1977 में जब जनता सरकार बनी, तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। आडवाणी जी विपक्ष में जितने प्रखर नेता रहे, प्रशासन में भी उतने ही कुशल साबित हुए। सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा आडवाणी जी के जीवन का एक ऐतिहासिक अध्याय है। इस यात्रा ने भारतीय समाज को एक सकारात्मक दिशा दी। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ने का अवसर मिला।
कराची में पले-बढ़े आडवाणी जी ने शायद ही कभी कल्पना की होगी कि जीवन उन्हें कितनी लंबी और असाधारण यात्रा पर ले जाएगा। देश के प्रति उनके योगदान के लिए कृतज्ञ राष्ट्र ने वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। आज जब आडवाणी जी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, मैं ईश्वर से उनके उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करता हूं। वे इसी तरह हम सभी को प्रेरणा देते रहें, हमारा मार्गदर्शन करते रहें।