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जिस फ्रांस को मैंने देखा: पेरिस की खूबसूरती और बदहाली का विरोधाभास
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फ्रांस में सड़कों पर जनाक्रोश
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
यह अगस्त 2009 की बात है। स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर से हम फ्रांस के पेरिस जा रहे थे। स्विट्जरलैंड, फ्रांस से बहुत महंगा है। इसलिए, बहुत-से लोग फ्रांस में किराये पर रहते हैं और स्विट्जरलैंड में काम करने आते हैं। बहुत-से लोग स्विट्जरलैंड से सामान की खरीदारी करने फ्रांस जाते हैं। फ्रांस में अरसे से बेरोजगारी बहुत है। 2026 में अब तक पुरुषों में बेरोजगारी 8.5 और महिलाओं में 8.2 प्रतिशत तक जा पहुंची है। यदि 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी देखें, तो यह 21.6 प्रतिशत है। युवा क्यों नाराज हैं, इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है।अपनी यात्रा के दौरान जब हम पेरिस रेलवे स्टेशन पर उतरे, तो लगा जैसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हों। बेहद गर्मी। बाहर निकले, तो दीवारों पर पुराने पेरिस के चित्र लगे दिखे। एक कोने में नशा करते लोग, दूसरी तरफ कुछ लोग ताश जैसा कुछ खेल रहे थे। चारों ओर गंदगी का साम्राज्य। पेरिस स्टेशन के पास ही, सर्विस अपार्टमेंट में सवेरे उठकर दलिया बनाया, खाया और कुछ साथ ले लिया। बाकी लोग तो किसी ऐसे होटल में खा सकते थे, जहां मांसाहारी खाना भी पकता हो, लेकिन मेरे साथ दिक्कत थी।
सवेरे घूमने निकले, तो पहले बहुत-से चर्च देखे। एक से एक सुंदर चर्च। फ्रांस की क्रांति के बाद जिस जेल में रानी मैरी एंटोनेट को रखा गया था, हम उसे देखने भी गए। जब इस रानी को गिलोटिन पर गर्दन काटने के लिए ले जाया जा रहा था, तब का एक चित्र भी वहां लगा हुआ है। उस जेल के कमरे इतने छोटे थे कि वहां कोई खड़ा कैसे होता होगा, यह सोचकर आश्चर्य होता था। दीवारों पर हजारों की संख्या में उन लोगों के बारे में भी लिखा था, जिन्हें इस क्रांति में मौत के घाट उतार दिया गया था। जिस क्रांति का नारा लिबर्टी, इक्वलिटी, फैटरनिटी था, उसमें इतनी क्रूरता क्यों बरती गई? आखिर क्रांति का मतलब हजारों, लाखों की जान लेना क्यों हो?
फ्रांस की क्रांति की पृष्ठभूमि जिन विचारकों ने तैयार की, उनमें वोल्टेयर का नाम प्रमुख है। 2023 में वोल्टेयर के गांव में उनके महल को भी देखने गई। वहां रिसेप्शन पर उनसे संबंधित कई पुस्तकें, ब्रोशर, बिल्ले और कपड़े आदि मिलते हैं। महल के पीछे वह कुआं भी है, जिससे उन दिनों पानी खींचा जाता रहा होगा। महल में उनकी वे किताबें खुली रखी हैं, जिन्हें अंतिम समय में वह पढ़ रहे थे। बर्तन, कपड़े, फर्नीचर, पेंटिंग्स, शयनकक्ष व अतिथियों का कमरा, सब कुछ वैसा का वैसा ही है। अपनी विरासत को कैसे सहेजा जा सकता है, इसकी सीख हम पश्चिम से ले सकते हैं।
हमने विजिटर्स बुक पर हस्ताक्षर किए और बाहर निकले। बरामदे के बाहर एक जगह बैठी, तो सामने बर्फ से ढका मोंट ब्लैंक नजर आया। इसे वहां ‘मो ब्लां’ कहते हैं। यह ख्याल भी आया कि कभी वोल्टेयर भी यहां बैठकर इस पहाड़ को देखते होंगे। अपनी पेरिस यात्रा के दौरान मैंने एफिल टावर के पास बैठकर दलिया खाया था। बहुत बड़े-बड़े कबूतरों को देखा, सीन नदी में क्रूज की यात्रा भी की, बाजार से गुजरते हुए इमली खरीदी, पर वह इमली न होकर कोई फली थी। एक जगह टैक्सी से उतरते हुए परिवार की एक लड़की का मोबाइल छीन लिया गया। छीनने वाला तूफान की गति से भाग निकला, देख भी नहीं सके। बाद में क्वीन फिल्म में भी बैग छीनने का ऐसा ही एक दृश्य देखा था। पेरिस डिज्नीलैंड में बहुत भीड़ थी। माथे की बिंदी देखकर लोग दूर से इशारा करते थे-इंदिया, इंदिया।
पिछले दिनों जब फ्रांस जल रहा था, तो लूवरे म्यूजियम के दृश्य भी दिखाए जा रहे थे। इसे वहां लूव्र कहते हैं। यह एक अनोखा म्यूजियम है। इसमें दुनियाभर की बेजोड़ कलाकृतियां रखी हैं। इतना बड़ा है कि एक दिन में पूरा घूमा नहीं जा सकता। यहीं विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग मोनालिसा भी है। फ्रांस दुनिया का फैशन हब माना जाता है। यहां बड़े-बड़े ब्रांड्स के महंगे परफ्यूम व डियोडरेंट आसानी से मिल जाते हैं। यहां के लोगों को लेकर यह धारणा भी प्रचलित है कि वे नियमित रूप से नहीं नहाते और शरीर की दुर्गंध छिपाने के लिए खूब डियोडरेंट व परफ्यूम का इस्तेमाल करते हैं। पर, यदि बेरोजगारी हो, जेब में पैसे न हों, खाने-पीने के लाले हों, तो महंगे ब्रांड्स चिढ़ाते ही हैं। आज न केवल फ्रांस, बल्कि लगभग पूरा यूरोप अपने ही बनाए नकली स्वर्ग में डूबने को अभिशप्त दिखाई दे रहा है।