फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   ED investigation reveals indraneel sen company transferred rupees of 30 lakhs to mamata banerjee accounts

ममता के खाते में 30 लाख: गया भी, मिला भी, लेकिन क्यों?

सार

ममता बनर्जी के खाते में ऑक्टेव रिकॉर्ड्स से करीब 30 लाख रुपये पहुंचे और पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन ने इसे ‘रॉयल्टी’ बताया। पैसा बैंकिंग चैनल से गया और मिला—लेकिन असली सवाल यही है कि आखिर क्यों मिला? किस गीत, धुन या रचना की रॉयल्टी थी, किस अधिकार के बदले भुगतान हुआ, दर क्या थी और 30 लाख रुपये की गणना किस आधार पर हुई?

विज्ञापन
ED investigation reveals indraneel sen company transferred rupees of 30 lakhs to mamata banerjee accounts
ममता बनर्जी - फोटो : ANI

विस्तार

बंगाल की राजनीति में एक बैंक ट्रांजेक्शन ने नया सवाल खड़ा कर दिया है। ईडी के मुताबिक, पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन की प्रोपराइटरशिप फर्म ऑक्टेव रिकॉर्ड्स के खाते से करीब 30 लाख रुपये तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खाते में बैंकिंग चैनल से ट्रांसफर हुए। सेन ने पूछताछ में इस रकम को ‘रॉयल्टी’ बताया।

विज्ञापन


पैसा गया—बैंक रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि हो सकती है।
पैसा मिला—यह भी बैंक रिकॉर्ड से स्पष्ट हो सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है—
आखिर क्यों मिला?
यही सवाल इस पूरे मामले का केंद्र बन गया है।

‘रॉयल्टी’ शब्द, लेकिन आधार क्या?

रॉयल्टी किसी गीत, किताब, संगीत रचना या दूसरे बौद्धिक अधिकार के इस्तेमाल के बदले दी जा सकती है। टीएमसी की ओर से भी कहा गया है कि ममता बनर्जी को उनकी किताबों, गीतों और संगीत रचनाओं की रॉयल्टी पहले से मिलती रही है और ऑक्टेव रिकॉर्ड्स उनके गीतों का विपणन करता था। पार्टी के मुताबिक भुगतान बैंकिंग चैनल से हुआ और उस पर टीडीएस भी काटा गया।
विज्ञापन


लेकिन यहीं से जांच का असली सवाल शुरू होता है।

रॉयल्टी किस गाने की?
किस धुन की?
किस अधिकार के बदले?
किस दर पर?
और 30 लाख ही क्यों?

अगर भुगतान नियमित रॉयल्टी था तो उसके पीछे कोई लेखा-आधार, अधिकार, बिक्री या भुगतान की गणना होनी चाहिए। अब यही दस्तावेजी कड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बैंक स्टेटमेंट बताएगा ‘कितना’, ‘क्यों’ नहीं

यह फर्क समझना जरूरी है।
बैंक रिकॉर्ड बता सकता है कि ऑक्टेव रिकॉर्ड्स से ममता बनर्जी के खाते में करीब 30 लाख रुपये गए।
लेकिन बैंक स्टेटमेंट अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह रकम रॉयल्टी ही थी।
उसके लिए अलग साक्ष्य चाहिए।

कौन-सा अनुबंध था?
किस रचना के अधिकार दिए गए थे?
कितनी बिक्री हुई?
रॉयल्टी की दर क्या थी?
कुल बिक्री कितनी हुई?
और उसी गणना से 30 लाख रुपये कैसे निकले?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब जांच को तलाशने होंगे।

अगर सीडी बिकीं, तो बिक्री कितनी हुई?

मामले में एक और महत्वपूर्ण कड़ी है—गानों की सीडी की बिक्री।

अगर 30 लाख रुपये रॉयल्टी के रूप में दिए गए, तो यह जानना जरूरी होगा कि संबंधित गानों या संगीत सामग्री की कुल बिक्री कितनी थी?
क्या ऑनलाइन बिक्री हुई?
क्या दुकानों के जरिए बिक्री हुई?
अगर कार्यकर्ताओं या समर्थकों को नकद सीडी बेची गईं तो कुल कितनी सीडी बिकीं और उनसे कितनी रकम आई?
क्या उसकी रसीदें हैं?
क्या बिक्री रजिस्टर है?
क्या कंपनी की किताबों में वह रकम दर्ज है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
जिस बिक्री के आधार पर रॉयल्टी बनी, उसका हिसाब कहां है?
यहीं 30 लाख रुपये की गणना का सवाल और गंभीर हो जाता है।

3.8 करोड़ की नकद जमा ने बढ़ाई जांच की गंभीरता

ईडी ने कहा है कि इंद्रनील सेन और उनकी प्रोपराइटरशिप फर्म के बैंक खातों में उनके मंत्री कार्यकाल के दौरान 3.8 करोड़ रुपये से अधिक नकद जमा हुए। एजेंसी इसी व्यापक मनी ट्रेल की जांच कर रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ईडी ने यह भी कहा है कि सेन के कार्यकाल में पर्यटन और संस्कृति विभाग से जुड़े 85 करोड़ रुपये से अधिक के कई टेंडर उनके करीबी बताए गए लोगों की कंपनियों को मिले। एजेंसी इन लेन-देन और आगे हुए धन के प्रवाह की भी जांच कर रही है।

इसी जांच के बीच ऑक्टेव रिकॉर्ड्स के खाते से ममता बनर्जी को गया 30 लाख रुपये का भुगतान सामने आया है।

लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है—
किसी खाते में पैसा जमा होना या किसी दूसरे खाते में पैसा ट्रांसफर होना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता।

जांच को यह स्थापित करना होगा कि पैसे का स्रोत क्या था और भुगतान का वास्तविक उद्देश्य क्या था।

अब असली कसौटी—‘रॉयल्टी’ का प्रमाण

इंद्रनील सेन ने ईडी को भुगतान का कारण ‘रॉयल्टी’ बताया है। लेकिन इस दावे की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके समर्थन में क्या दस्तावेज और लेखा रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। ईडी की सार्वजनिक जानकारी में अभी भुगतान को लेकर कोई आपराधिकता आरोपित नहीं की गई है।

इसलिए सवाल ममता बनर्जी के बारे में निष्कर्ष निकालने का नहीं, बल्कि लेन-देन की प्रकृति तय करने का है।

क्या यह नियमित रॉयल्टी थी?
अगर थी, तो उसका आधार क्या था?
और अगर रॉयल्टी थी तो—

30 लाख रुपये की गणना किस फॉर्मूले से हुई?
क्या जांच भुगतान पाने वाले तक पहुंचेगी?

यह अभी कहना जल्दबाजी होगी कि ईडी इस लेन-देन के आधार पर ममता बनर्जी के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ईडी बयान में उन्हें आरोपी नहीं बताया गया है और इस भुगतान में आपराधिकता भी आरोपित नहीं की गई है।


लेकिन जांच का स्वाभाविक अगला सवाल जरूर है—
पैसा कहां से आया?
क्यों दिया गया?
किस आधार पर दिया गया?
और क्या उस आधार का स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण है?

यही सवाल आगे की जांच की दिशा तय कर सकते हैं।

पैसा गया, पैसा मिला… लेकिन क्यों?
इस पूरे मामले की सबसे दिलचस्प कड़ी शायद यही है।

30 लाख रुपये का ट्रांसफर—पहला तथ्य।
उसे ‘रॉयल्टी’ बताना—दूसरा तथ्य।
लेकिन—
रॉयल्टी क्यों? किसकी? किस अधिकार के बदले? और 30 लाख ही क्यों?

इन सवालों के जवाब दस्तावेज, बिक्री का हिसाब और लेखा रिकॉर्ड दे सकते हैं।
इसलिए अभी सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि “ममता पर ईडी का शिकंजा कसेगा या नहीं?”
सबसे बड़ा सवाल है—

“ममता के खाते में 30 लाख रुपये पहुंचे… लेकिन आखिर क्यों?”
इस सवाल का जवाब जितना साफ होगा, उतनी ही साफ होगी इस पूरे लेन-देन की तस्वीर।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed