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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला: 22 साल बाद दंपती को मिली आईवीएफ की अनुमति

Wed, 07 Oct 2026 05:19 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Wed, 07 Oct 2026 05:19 PM IST
सार

हाई कोर्ट ने 22 वर्ष से संतान की आस लगाए एक दंपती को बड़ी राहत देते हुए सहायक प्रजनन तकनीक यानी आईवीएफ उपचार की अनुमति दे दी है।

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Chhattisgarh High Court verdict: Couple granted IVF permission after 22 years
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 22 वर्ष से संतान की आस लगाए एक दंपती को बड़ी राहत देते हुए सहायक प्रजनन तकनीक यानी आईवीएफ उपचार की अनुमति दे दी है। अदालत ने उस प्रशासनिक आदेश को पूर्णतः रद्द कर दिया, जिसके तहत केवल पति की उम्र 55 वर्ष से अधिक होने के आधार पर 47 वर्षीया पत्नी को उपचार देने से इन्कार कर दिया गया था।
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जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने स्पष्ट किया कि संबंधित कानून महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा तय करता है, न कि पति-पत्नी की संयुक्त आयु को पात्रता का आधार बनाता है। ऐसे में कानून में उल्लेख न होने वाली अतिरिक्त शर्त के आधार पर निर्धारित आयु सीमा के भीतर मौजूद महिला को मां बनने के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
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पति-पत्नी की संयुक्त आयु को लेकर कोई रोक नहीं
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कानून की विभिन्न व्यवस्थाओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि जब विधायिका ने कानून बनाते समय महिला के लिए 50 वर्ष और पुरुष के लिए 55 वर्ष की अलग-अलग अधिकतम आयु सीमा निर्धारित की है, तो उसमें न्यायालय या प्राधिकरण कोई नई पाबंदी नहीं जोड़ सकते। पीठ ने टिप्पणी की कि कानून बनाने वाली संस्था ने पति-पत्नी की संयुक्त आयु को लेकर कोई रोक नहीं लगाई है। अदालत के अनुसार संतान प्राप्ति और प्रजनन से जुड़े निर्णय किसी भी व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अभिन्न पहलू हैं। इन अधिकारों को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाली व्यक्तिगत आजादी की परिधि में देखा जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि मनेंद्रगढ़ निवासी महिला चिकित्सीय रूप से आईवीएफ के लिए पूरी तरह योग्य है और पति की उम्र के अलावा उपचार में कोई अन्य चिकित्सीय बाधा नहीं है।
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दो दशक से अधिक का लंबा संघर्ष
मनेंद्रगढ़ के सिविल लाइंस क्षेत्र में रहने वाले प्रदीप कुमार तिवारी और उनकी पत्नी अर्चना तिवारी बीते 22 साल से संतान सुख पाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान में अर्चना की आयु लगभग 47 वर्ष और प्रदीप की आयु 57 वर्ष है। इस दंपती ने पूर्व में भी चिकित्सा विज्ञान का सहारा लिया था। वर्ष 2013 में अर्चना ने अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान यानी आईयूआई प्रक्रिया के माध्यम से उपचार कराया था। इसके बाद वर्ष 2015 में वह गर्भवती भी हुईं, परंतु लगभग चार महीने बाद उनका गर्भपात हो गया। इस दुखद घटना के बावजूद दंपती ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा और रायपुर स्थित आयुष टेस्ट ट्यूब सेंटर से संपर्क किया। वहां आवश्यक चिकित्सीय जांच और विशेषज्ञों के परामर्श के उपरांत दंपती को आईवीएफ प्रक्रिया के लिए उपयुक्त माना गया। इसके बाद 24 जून को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अनुमति हेतु आवेदन किया गया, जिसे 31 जुलाई 2026 को इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि पति की उम्र 57 वर्ष हो चुकी है।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता दंपती की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता गगन तिवारी ने अदालत के समक्ष तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कानून में पुरुष हेतु 55 वर्ष और महिला हेतु 50 वर्ष की सीमा अलग-अलग रखी गई है। संयुक्त आयु को लेकर कोई विधिक सीमा तय नहीं है, इसलिए 57 वर्षीय पति के कारण 47 वर्षीया पत्नी को इलाज से रोकना अनुचित है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए प्रजनन के अधिकार को मौलिक अधिकारों का हिस्सा बताया। दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि कानून में पुरुष के लिए 55 वर्ष की सीमा स्पष्ट रूप से अंकित है। जब विधायिका ने आयु सीमा का स्पष्ट प्रावधान किया है, तो व्यक्तिगत परिस्थितियों को देखकर अदालत उस सीमा में छूट या बदलाव नहीं कर सकती।


अस्पताल और भावी उपचार के लिए राहत
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने दंपती के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए भविष्य की परिस्थितियों को लेकर भी स्थिति साफ कर दी। अदालत ने कहा कि यदि आदेश के बाद प्रक्रिया शुरू होती है और उपचार के दौरान महिला की आयु 50 वर्ष पूरी हो जाती है, तो केवल उम्र बढ़ने के कारण चलते हुए इलाज को बीच में नहीं रोका जाएगा। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इलाज जारी रखने के लिए अन्य सभी चिकित्सीय, नैतिक और वैधानिक नियमों का पालन करना अनिवार्य रहेगा। इसके अतिरिक्त, हाई कोर्ट ने उपचार करने वाले रायपुर के आयुष टेस्ट ट्यूब सेंटर को भी कानूनी संरक्षण प्रदान किया। कोर्ट ने कहा कि यदि अस्पताल सभी विधिक और चिकित्सीय शर्तों का पालन करते हुए दंपती का उपचार करता है, तो केवल पति की आयु 55 वर्ष से अधिक होने के आधार पर उस संस्थान के विरुद्ध कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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