भाजपा में सनसनी : लेनिनग्राद में कमल का बीज बोने वाले रामलखन सिंह जा रहे जन सुराज? क्यों मची बेगूसराय में रार
Amar Ujala Interview : जब बिहार भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कैलाशपति मिश्र की जयंती मनाई जा रही है, उसी दिन बेगूसराय में पार्टी के लिए यही भूमिका निभाने वाले रामलखन सिंह के दल छोड़ने की खबर है। क्या यह सही है? उन्होंने खुद बताया।
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लोग इसे पूरब का लेनिनग्राद कहते थे। भारत का लेनिनग्राद तो माना ही जाता था। वाम का गढ़ था। तब यहां भारतीय जनता पार्टी का नाम लेने वाले कुछ लोग थे। ऐसे चुनिंदा लोगों में से कुछेक को पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी तक जानते थे। बिहार में भाजपा की ऐसी ही शख्सियत के जन सुराज में जाने की खबर पटना तक पहुंची है। भाजपा बदल चुकी है, इसलिए असर कितना पड़ेगा- कोई बात करने वाला नहीं। हां, यह सनसनी जरूर है क्योंकि नाम बहुत चर्चित रहा है- रामलखन सिंह। कई कारणों से चर्चित रह चुके रामलखन सिंह तब भाजपा को 'पूरब के लेनिनग्राद' में जमाने के लिए जाने गए थे, अब जन सुराज में जाने की चर्चा के कारण खबरों में हैं। 'अमर उजाला' ने उनसे बात की तो उन्होंने एक बात को स्वीकार, दूसरे से इनकार किया। साथ ही कारणों पर भी चर्चा की।
प्र. जब बिहार भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कैलाशपति मिश्र की जयंती मनाई जा रही है, उसी दिन बेगूसराय में पार्टी के लिए यही भूमिका निभाने वाले रामलखन सिंह के दल छोड़ने की खबर है। क्या यह सही है?
उ. बहुत कष्टदायक फैसला है, लेकिन यह बात सही है। मैंने भाजपा छोड़ दी है। उस पार्टी को छोड़ने का फैसला लिया है, जिसे यहां पर खड़ा करने में दिन-रात एक किया था।
प्र. तो क्या प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज में ज्वाइन कर रहे हैं?
उ. नहीं। भाजपा छोड़ने की बात सही है, लेकिन जन सुराज ज्वाइन करने की बात सही नहीं।
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प्र. क्या करने वाले हैं फिर?
उ. राजनीतिक दिशा को लेकर कार्यकर्ताओं और समर्थकों से बातचीत के बाद फैसला करेंगे।
प्र. भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष को आखिर परेशानी कहां हुई कि इस उम्र में आकर यह फैसला कर रहे?
उ. पार्टी के लिए वर्षों से काम करने वाले पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को वह सम्मान नहीं मिल पा रहा, जिसके वे हकदार हैं। लंबे समय तक संगठन के लिए मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से निराश होना स्वाभाविक है। राजनीति में कार्यकर्ता ही संगठन की नींव होते हैं, लेकिन जब पुराने कार्यकर्ताओं को ही महत्व नहीं मिलता तो स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं।
प्र. क्या ताजा कोई मामला है, जिससे आपको परेशानी हुई?
उ. यह एक दिन की बात नहीं। अलग राह पर चल रही है पार्टी। भाजपा में कौन मुख्यमंत्री कब बन जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं है। बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और नेतृत्व के स्तर पर होने वाले बदलावों के बीच पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है। पुराने लोग अचरज भरे फैसले सुन-देख कर थक गए हैं। भाजपा से अलग होने का फैसला किसी एक दिन की नाराजगी का परिणाम नहीं है, बल्कि लंबे समय से महसूस हो रही परिस्थितियों के बाद यह कठोर निर्णय लेना पड़ा है।
प्र. परेशानी किसी व्यक्ति विशेष से तो नहीं?
उ. नहीं। हर तरफ अराजक स्थिति है। भाजपा के सांसद-विधायक बनाने वाले भाजपाइयों को नहीं पूछा जा रहा है। पहले शीर्ष नेतृत्व पहचानता था, अब किसी पुराने नेता को कोई महत्व नहीं दिया जाता। न कभी पूछा जाता है और न कुछ बताया जाता है। कौन-क्या कर रहा, पता नहीं चलता है। ऐसे में पार्टी चल कैसे रही, यही पता नहीं चलता है।
(इनपुट- संजीव आर्य, बेगूसराय)