बिहार: पितृपक्ष की दशमी पर गयाशिर और गयाकूप वेदी पर हुआ त्रिपिंडी श्राद्ध, पितरों की मुक्ति की कामना
पितृपक्ष की दशमी तिथि पर गयाजी के गयाशिर और गयाकूप वेदी पर श्रद्धालुओं ने त्रिपिंडी श्राद्ध किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां पिंडदान और तर्पण से अकाल मृत्यु वाले पितरों की शांति, सद्गति और पितृदोष से मुक्ति की कामना की जाती है।
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पितृपक्ष की दशमी तिथि पर गयाजी धाम में पिंडदान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन गयाशिर और गयाकूप वेदी पर श्रद्धालु त्रिपिंडी श्राद्ध कर अपने पूर्वजों की शांति, सद्गति और मोक्ष की कामना करते हैं। गयापाल पंडा बबलू मउआर के अनुसार, इन दोनों वेदियों पर किया जाने वाला विधान पितृ तर्पण की परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है।
गयाशिर में प्रेत योनि से मुक्ति की मान्यता
गयापाल पंडा बबलू मउआर ने बताया कि गयाजी की पिंडवेदियों में गयाशिर का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गयासुर से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण यह स्थान पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड के लिए फलदायी माना जाता है। दशमी के दिन श्रद्धालु उन पूर्वजों के नाम से यहां पिंडदान और तर्पण करते हैं, जिनकी मृत्यु असामयिक परिस्थितियों में हुई हो या जिनकी आत्मिक शांति के लिए परिवार धार्मिक विधान करता आया हो। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया यह कर्म पूर्वजों की तृप्ति और सद्गति की कामना से जुड़ा है।
गयाकूप में तीन पिंडों का विशेष विधान
बबलू मउआर ने बताया कि गयाकूप वेदी पर त्रिपिंडी श्राद्ध का अलग विधान है। इसमें तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें धार्मिक परंपरा में सृष्टि के तीन प्रमुख देव स्वरूपों और तीन गुणों से जोड़ा जाता है। परंपरा के अनुसार, जौ का पिंड भगवान विष्णु, चावल का पिंड भगवान ब्रह्मा और तिल का पिंड भगवान रुद्र के निमित्त अर्पित किया जाता है। इसके माध्यम से पितरों से जुड़े विभिन्न दोषों और अशांति की शांति की कामना की जाती है।
अकाल मृत्यु वाले पितरों के लिए विशेष पूजा
गयापाल पंडा ने बताया कि त्रिपिंडी श्राद्ध खास तौर पर उन पितरों के निमित्त भी कराया जाता है, जिनकी मृत्यु सामान्य आयु पूरी होने से पहले हो गई हो। दुर्घटना, बीमारी अथवा अन्य असामयिक कारणों से मृत्यु को प्राप्त हुए परिजनों की आत्मिक शांति के लिए श्रद्धालु यहां विशेष रूप से कर्मकांड करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसे पूर्वजों के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने से उनकी सद्गति की कामना की जाती है।
पितृदोष शांति के लिए भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पारिवारिक पितृदोष की शांति की कामना लेकर गयाधाम पहुंचते हैं। गयापाल पंडा के अनुसार, जिन परिवारों में लंबे समय से पितरों का नियमित श्राद्ध या तर्पण नहीं हो पाया है, वे भी गया में पिंडदान और संबंधित धार्मिक विधान कराते हैं। हालांकि पितृदोष से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक परंपराओं और विश्वासों का हिस्सा हैं, श्रद्धालु इसे परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और पूर्वजों की तृप्ति से जोड़कर देखते हैं।
मंत्रोच्चार के बीच पितरों की मुक्ति की कामना
दशमी तिथि पर गयाशिर और गयाकूप वेदी पर पिंडदान करने पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था देखने को मिली। मंत्रोच्चार और वैदिक विधि के बीच पिंड अर्पित कर श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताई और उनकी आत्मा की शांति, सद्गति तथा मोक्ष की कामना की। बबलू मउआर ने कहा कि गयाधाम में पिंडदान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवित पीढ़ी का अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य निभाने का माध्यम भी है। दशमी के दिन गयाशिर और गयाकूप पर होने वाला त्रिपिंडी श्राद्ध इसी आस्था और परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है।