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खबरों के खिलाड़ी: क्या बनने से पहले ही सपा-कांग्रेस गठबंधन में पड़ी गांठ, कहां अटकी बात? विश्लेषकों से समझें

Sun, 11 Oct 2026 09:10 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की रस्साकस्सी जारी है। दोनों दल अपने-अपने दावे कर रहे हैं। दोनों के बड़े नेता गठबंधन को लेकर भले कोई स्पष्ट बयान नहीं दे रहे हो, लेकिन स्थानीय स्तर के पदाधिकारियों के बीच जुबानी जंग जारी है। इसके बीच कांग्रेस ने अपना प्रदेश अध्यक्ष भी बदल दिया है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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पीयूष पंत: अभी अगर हम वर्तमान में देखें तो एक तरह की दुविधा की स्थिति है। बीते कुछ समय से मनमुटाव की खबरें आ रही हैं। ये दिखाई भी दे रहा है। इस तरह के जेश्चर चुनाव में पार्टियां करती हैं। कांग्रेस बार-बार इस तरह के कदम उठाती है या यूं कहें कि ये एक तरह की बीमारी है कांग्रेस में और कांग्रेस उसे दूर करने की कोशिश भी नहीं कर रही है। ये हमने बिहार चुनाव के दौरान भी देखा था। पंजाब में भी में इसी तरह की स्थिति देख रहे हैं। राजस्थान में भी हमने देखा था। कांग्रेस अपनी मजबूत पकड़ को बार-बार गंवा देती है। राहुल गांधी जो माहौल बनाते हैं उसका असर संगठन पर नहीं हो पा रहा है। 
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अनुराग वर्मा: जितना इस गठबंधन को लेकर मीडिया बात कर रहा है। उतना खुद वो गठबंधन भी बात नहीं कर रहा है। ये चर्चा जो अभी हो रही है वही चर्चा नामांकन दे दिन तक होती रहेगी। उत्तर प्रदेश की जनता को आप सोशल मीडिया से वोट नहीं डलवा सकते हैं। अखिलेश यादव के पास एक अपर हैंड है। उनकी पार्टी जमीन पर वहीं, कांग्रेस पार्टी हवा में है। कांग्रेस को गठबंधन के लिए थोड़ा व्यवहारिक होना पड़ेगा। 

विनोद अग्निहोत्री: चुनाव में संगठन और अवधारणा दोनों काम करते हैं। 2024 में एक अवधारणा बन गई कि चुनाव खतरे में है। इसके साथ जहां विपक्ष का संगठन मजबूत था वहां उसे फायदा मिल गया। उत्तर प्रदेश में बड़े भाई की भूमिका में समाजवादी पार्टी है ये कांग्रेस भी मानती है। समाजवादी पार्टी का संगठन उत्तर प्रदेश में मजबूत है फिर भी 2017 में सिर्फ 47 सीटें ही आईं। 2019 में सिर्फ पांच सीटें आईं, जबकि बसपा से गठबंधन भी था। इसलिए सिर्फ संगठन से ही काम नहीं चलेगा। अवधारणा पर भी काम करना होगा।
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