आम धारणा है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर का दर्द लगातार बढ़ता जाता है, लेकिन दुनिया के 118 देशों में 61 लाख से अधिक लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन ने इस तस्वीर के कई पहलुओं को सामने रखा है। शोध के अनुसार शरीर के कई हिस्सों में दर्द 55 साल की उम्र से पहले सबसे तेजी से बढ़ता है। वहीं, महिलाओं में लगभग सभी प्रमुख शारीरिक हिस्सों के दर्द की व्यापकता पुरुषों से अधिक पाई गई। पीठ, कूल्हे और घुटनों का दर्द हालांकि उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता रहता है और 75 वर्ष या उससे अधिक उम्र में चरम पर पहुंच सकता है।
अध्ययन में सभी 11 प्रमुख शारीरिक हिस्सों में महिलाओं के बीच दर्द की व्यापकता पुरुषों से अधिक दर्ज की गई। महिलाओं में चेहरे के दर्द की व्यापकता पुरुषों के मुकाबले 83 प्रतिशत, सिरदर्द 74 प्रतिशत और पेट या उदर के दर्द की व्यापकता 60 प्रतिशत अधिक थी।यह अंतर बताता है कि दर्द का बोझ महिला और पुरुषों में समान नहीं है।हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर महिलाओं में दर्द अधिक होने का कोई एक निश्चित कारण नहीं बताया जा सकता। जैविक अंतर, जीवन की परिस्थितियां और अन्य जोखिम कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
अध्ययन के मुताबिक, सिरदर्द, पेट, चेहरे, गर्दन, कंधे और कोहनी सहित सात प्रकार के दर्द की व्यापकता मध्य से अधिक उम्र के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचती है। इसके बाद इनमें गिरावट आने लगती है। इसके विपरीत पीठ, कूल्हे और घुटनों का दर्द बढ़ती उम्र के साथ अधिक आम होता जाता है और 75 वर्ष या उससे अधिक आयु में चरम पर पहुंच सकता है।शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द की समग्र व्यापकता पांच वर्ष की उम्र में करीब 30 प्रतिशत से बढ़कर 100 वर्ष या उससे अधिक उम्र में लगभग 70 प्रतिशत हो जाती है। तेज दर्द की व्यापकता करीब 50 वर्ष की उम्र के आसपास, जबकि शरीर के कई हिस्सों में फैले दर्द की व्यापकता लगभग 70 वर्ष की उम्र में चरम पर पहुंचती है।
शोधकर्ताओं ने देशों की स्थिति की तुलना मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के आधार पर भी की। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे पहलुओं को शामिल किया जाता है। नतीजों के अनुसार, 40 वर्ष की उम्र के बाद कम एचडीआई वाले देशों में शरीर के किसी भी हिस्से, जोड़ों और पीठ के दर्द की व्यापकता अधिक तेजी से बढ़ी।80 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में कम एचडीआई वाले देशों में पीठ के निचले हिस्से के दर्द की व्यापकता उच्च एचडीआई वाले देशों की तुलना में लगभग दोगुनी पाई गई। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, कामकाज की परिस्थितियां और अन्य बीमारियां इस अंतर से जुड़ी हो सकती हैं, हालांकि अध्ययन इनके प्रभाव को निर्णायक रूप से साबित नहीं करता।
अध्ययन में धूम्रपान, मोटापे और कम घरेलू आय का संबंध शरीर के विभिन्न हिस्सों में दर्द की अधिक व्यापकता से पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, धूम्रपान, मोटापा और कम घरेलू आय दुनिया भर में शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाले दर्द के कुल मामलों में करीब 18 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
यह अध्ययन दर्द की रोकथाम और स्वास्थ्य नीतियां तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है। इसके अनुसार बचाव के उपाय केवल बुजुर्गों तक सीमित रखने के बजाय युवावस्था और मध्य आयु से शुरू होने चाहिए। साथ ही शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द की प्रकृति और उससे जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखकर उपाय तय करना जरूरी है।इतने बड़े वैश्विक आंकड़ों के आधार पर किया गया यह विश्लेषण बताता है कि दर्द का बोझ उम्र, लिंग और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।