जलवायु परिवर्तन की मार: अंटार्कटिका में 14 साल में दो-तिहाई घट गए पेंगुइन, समुद्र गर्म होने से कितना खतरा?
जलवायु परिवर्तन की मार अंटार्कटिका में भी दिखने लगी है। 14 साल में पेंगुइन दो-तिहाई घट गए। समुद्र के गर्म होने से भोजन की तलाश मुश्किल होती जा रही है। जावोडोव्स्की द्वीप पर प्रजनन करने वाले पेंगुइन करीब पांच लाख कम हो गए हैं।
विस्तार
अंटार्कटिका की बर्फीली दुनिया में पेंगुइनों की विशाल बस्ती अब तेजी से सिमट रही है। जावोडोव्स्की द्वीप पर दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंगुइन कॉलोनियों में से एक की आबादी 2011 से 2025 के बीच करीब दो-तिहाई घट गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र का बढ़ता तापमान और भोजन की उपलब्धता में बदलाव इस गिरावट के प्रमुख संभावित कारण हैं। इस नुकसान का असर केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंटार्कटिका की पूरी समुद्री खाद्य शृंखला के लिए खतरे का संकेत हो सकता है।
यह गिरावट इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि जावोडोव्स्की द्वीप कभी लाखों पेंगुइनों के प्रजनन और उनके सामूहिक जीवन के लिए जाना जाता था। अब यहां बदलते पर्यावरण के बीच कुछ प्रजातियों की संख्या घट रही है, जबकि दूसरी प्रजाति अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई दे रही है।यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इसमें 2011 से 2025 के बीच द्वीप पर पेंगुइनों की आबादी में आए बदलाव और संभावित कारणों का विश्लेषण किया गया है।
14 साल में भारी गिरावट, लाखों पेंगुइनों का ठिकाना प्रभावित
जावोडोव्स्की द्वीप दक्षिण अटलांटिक क्षेत्र के दक्षिण सैंडविच द्वीपसमूह का हिस्सा है। यहां वर्ष 2011 में लगभग छह लाख चिनस्ट्रैप पेंगुइन प्रजनन करते थे। इसके अलावा करीब 90 हजार मैकरोनी पेंगुइन भी मौजूद थे। उस समय यह द्वीप पेंगुइनों की विशाल बस्तियों के लिए जाना जाता था।लेकिन अगले 14 वर्षों में चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की संख्या में इतनी बड़ी गिरावट दर्ज की गई कि अनुमानित तौर पर करीब पांच लाख प्रजनन करने वाले पक्षियों का नुकसान हुआ। इस बदलाव के बाद वैज्ञानिकों का आकलन है कि पेंगुइनों की संख्या के लिहाज से अंटार्कटिका का केप अडारे क्षेत्र महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।
समुद्र गर्म हुआ तो भोजन भी दूर चला गया
चिनस्ट्रैप पेंगुइनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भोजन जुटाने की है। इनके आहार में अंटार्कटिक क्रिल की अहम भूमिका होती है। क्रिल छोटे झींगा जैसे समुद्री जीव हैं, जो अंटार्कटिका के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन पर पेंगुइनों के अलावा व्हेल और सील जैसे दूसरे समुद्री जीव भी निर्भर करते हैं।समुद्र के तापमान और बर्फ की परिस्थितियों में बदलाव से क्रिल के वितरण पर असर पड़ रहा है। इनके दक्षिण की ओर खिसकने से चिनस्ट्रैप पेंगुइनों को भोजन के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। इससे उन्हें ऊर्जा खर्च करने के साथ अपने बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने में भी कठिनाई हो सकती है।अंटार्कटिक प्रायद्वीप और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ता तापमान इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल बर्फ पिघलने या समुद्र का स्तर बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह समुद्री जीवों के आवास, भोजन की उपलब्धता और प्रजातियों के आपसी संबंधों को भी बदल रहा है।
एक ही द्वीप पर अलग-अलग नतीजे
जावोडोव्स्की द्वीप की एक खास बात यह है कि यहां चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की संख्या घटने के विपरीत मैकरोनी पेंगुइनों की आबादी में लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। यह अंतर बताता है कि पर्यावरण में होने वाले बदलावों का असर सभी प्रजातियों पर एक जैसा नहीं पड़ता।मैकरोनी पेंगुइन भोजन के मामले में अपेक्षाकृत अधिक विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके विपरीत, चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की भोजन संबंधी जरूरतें और उनकी तलाश का तरीका बदलती परिस्थितियों में नुकसानदेह साबित हो सकता है।हालांकि, मैकरोनी पेंगुइनों की संख्या में वृद्धि से चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी में आई भारी कमी की भरपाई नहीं होती। दोनों प्रजातियों की अलग-अलग स्थिति यह समझने में मदद करती है कि बदलती जलवायु से निपटने की क्षमता हर जीव में समान नहीं होती।
ज्वालामुखी विस्फोट जिम्मेदार या जलवायु परिवर्तन?
द्वीप पर पेंगुइनों की घटती संख्या को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अन्य संभावित कारण की भी जांच की। वर्ष 2016 में यहां ज्वालामुखी गतिविधि हुई थी। इसके बाद आशंका जताई गई कि राख और लावा से पेंगुइनों के आवास को नुकसान पहुंचा होगा। इस विचार को ‘पेंगुइन पोम्पेई’ परिकल्पना कहा गया।लेकिन अध्ययन में सामने आए आबादी संबंधी रुझान किसी एक घटना के बाद अचानक आई गिरावट के बजाय लंबे समय से जारी कमी की ओर संकेत करते हैं। साथ ही, चिनस्ट्रैप पेंगुइनों के ज्वालामुखी से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र से दूर रहने की बात भी सामने आई। इसलिए ज्वालामुखी को आबादी में गिरावट का मुख्य कारण मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।वैज्ञानिकों के आकलन में जलवायु परिवर्तन और भोजन की उपलब्धता में बदलाव अधिक महत्वपूर्ण संभावित कारण हैं। हालांकि, किसी एक कारक को पूरी गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय दूसरे पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन भी जरूरी है।
पेंगुइनों की कमी से बिगड़ सकता है समुद्री संतुलन
पेंगुइन अंटार्कटिका की खाद्य शृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे क्रिल और दूसरे समुद्री जीवों पर निर्भर रहते हैं और खुद भी बड़े शिकारी जीवों के भोजन का हिस्सा बनते हैं। उनकी आबादी में तेज गिरावट समुद्र में ऊर्जा और पोषक तत्वों के प्रवाह को प्रभावित कर सकती है। यदि भोजन की उपलब्धता घटती रही और प्रजनन की सफलता प्रभावित हुई, तो पेंगुइनों की आबादी पर दबाव और बढ़ सकता है। इसका असर दूसरी प्रजातियों तथा उनके बीच भोजन के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के लिए अब बड़ी चुनौती यह समझना है कि यह गिरावट कितनी व्यापक है और आने वाले वर्षों में इसकी रफ्तार क्या रहेगी। लगातार निगरानी से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी संभल सकती है या उन्हें और गंभीर संरक्षण की जरूरत होगी।अंटार्कटिका को अक्सर इंसानी गतिविधियों से दूर एक सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र माना जाता है, लेकिन वहां हो रहे बदलाव दिखाते हैं कि जलवायु परिवर्तन की पहुंच कितनी व्यापक है। दुनिया के किसी दूरस्थ द्वीप पर पेंगुइनों की घटती संख्या भी इस बात का संकेत है कि गर्म होती पृथ्वी का असर जीवों के आवास और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।