सीईईडब्ल्यू का अध्ययन: हिमाचल के गांव अपना रहे जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के प्रयास, शिमला में जारी हुई रिपोर्ट
प्रदेश के गांवों में जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन के प्रयास पहले से चल रहे हैं। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन से सामने आई है।
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हिमाचल प्रदेश के गांवों में जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन के प्रयास पहले से चल रहे हैं। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन से सामने आई है। इसे इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (इसीमोड) के सहयोग से किया गया है। अध्ययन में मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। इन पंचायतों में किसान नई फसलें अपना रहे हैं और जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर रहे हैं। शोघी में राज्य की पहली ग्राम आपदा प्रबंधन समिति भी गठित की गई है। रिपोर्ट को शनिवार को हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा के अतिरिक्त सचिव निशांत ठाकुर ने जारी किया। इस अवसर पर डॉ. अमीना महर्जन और राजीव अहल भी उपस्थित थे। सीईईडब्ल्यू ने स्ट्रैटेजिक फोरसाइट पद्धति का उपयोग कर 25 अनुकूलन समाधान खोजे हैं। इन समाधानों को 30 से अधिक सरकारी नीतियों से मदद मिल सकती है।
अनुकूलन के स्थानीय प्रयास
शिमला के संधू में 20 से अधिक परिवार प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। कुल्लू के बजौरा में किसानों ने सेब की जगह जापानी फल की खेती शुरू की है। सिरमौर के परारा में लोगों ने लहसुन को सेब के साथ उगाना शुरू किया है। थाना कशोगा में महिला समूह 35 में से 5 बावड़ियों को पुनर्जीवित कर चुके हैं। शोघी पंचायत ने 2023 के भूस्खलन के बाद अपनी ग्राम आपदा प्रबंधन समिति बनाई है। ग्रामीणों को प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया गया है।
आपदा प्रबंधन और आगे की राह
हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एचपीएसडीएमए) ने 2026 में आपदा रक्षक योजना शुरू की है। अध्ययन में पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया गया है। एचपीएसडीएमए के निशांत ठाकुर ने कहा कि हाल की आपदाओं से 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। उन्होंने पूर्व सक्रिय तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। सीईईडब्ल्यू की श्रेया वधावन ने स्थानीय चैंपियनों और सरकारी सहायता के संयोजन को महत्वपूर्ण बताया। इसीमोड की डॉ. अमीना महर्जन ने कहा कि अनुकूलन की शुरुआत ग्रामीणों से हो सकती है।