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हिमाचल: 35 साल बाद परिवार से मिलीं ओडिशा की प्रमिला, एक टैटू ने खोल दिया अपनों तक पहुंचने का रास्ता
Mon, 21 Sep 2026 01:36 PM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी।
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Mon, 21 Sep 2026 01:36 PM IST
सार
कभी अपनों से बिछड़ीं, फिर शिमला के मानसिक स्वास्थ्य केंद्र, नारी निकेतन और मंडी के भंगरोटू वृद्ध आश्रम तक पहुंचीं प्रमिला को आखिरकार 35 साल बाद अपने परिवार की आवाज सुनने को मिली। उनकी बांह पर बना ओड़िया भाषा का एक टैटू और कटक समेत कुछ स्थानों की धुंधली यादें परिवार की तलाश में सबसे बड़े सुराग बने।
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मोबाइल पर परिवार से बात करते हुए प्रमिला।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
कहते हैं, कुछ रिश्ते वक्त की मार से टूटते नहीं, बस कहीं दूर छूट जाते हैं। फिर कभी कोई छोटी-सी निशानी, कोई अधूरी याद या किसी नाम का एक टुकड़ा उन रिश्तों तक पहुंचने का रास्ता खोल देता है। ओडिशा की प्रमिला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
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करीब 35 साल तक परिवार से दूर रहने के बाद रविवार को वह पल आया, जिसका शायद प्रमिला और उनके परिवार दोनों को ही वर्षों से इंतजार था। एक वीडियो कॉल पर जब सामने अपने लोग दिखाई दिए और कानों में अपनों की आवाज पड़ी तो 35 साल की दूरी जैसे अचानक खत्म हो गई। आंखों में खुशी थी, भावनाएं थीं और उन वर्षों की खामोश कहानी भी, जिन्हें शब्दों में कहना शायद आसान नहीं था। एक तरफ मंडी में बैठीं प्रमिला थीं और दूसरी तरफ ओडिशा में उनका परिवार। बीच में सिर्फ एक मोबाइल स्क्रीन थी, लेकिन उस स्क्रीन ने वर्षों से टूटा हुआ संपर्क फिर जोड़ दिया।
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बांह पर बना एक टैटू बना सबसे बड़ा सुराग
प्रमिला मूल रूप से अलुपुआ पंचायत, जिला केंद्रापड़ा, ओडिशा की रहने वाली हैं। हालांकि, कुछ संस्थागत रिकॉर्ड में उनका नाम रामकली मलिक दर्ज है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने वर्ष 2011 से 2018 तक शिमला स्थित एक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में समय बिताया। इसके बाद वह शिमला के नारी निकेतन में रहीं और बाद में मंडी के भंगरोटू वृद्ध आश्रम पहुंचीं।
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समय बीतता गया, लेकिन उनके अतीत की कुछ यादें उनके साथ बनी रहीं। जब परिवार की तलाश की कोशिश शुरू हुई तो प्रमिला से उनके घर और अतीत के बारे में बातचीत की गई। उनकी यादों के धागे बहुत स्पष्ट नहीं थे, लेकिन उन्हीं धुंधली यादों में कुछ ऐसे संकेत छिपे थे, जो आगे चलकर बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए। उनकी बांह पर बना ओड़िया भाषा का टैटू उनमें से एक था। प्रमिला ने बातचीत के दौरान कटक और ओडिशा के कुछ अन्य स्थानों का भी जिक्र किया। यही छोटी-छोटी बातें परिवार की तलाश के लिए सुराग बनती चली गईं।
'मिशन अपनों तक' ने बिखरी यादों को जोड़ा
प्रमिला को उनके परिवार तक पहुंचाने के लिए ‘मिशन अपनो तक’ के तहत प्रयास शुरू किए गए। एसडीएम बल्ह समृतिका नेगी ने तहसील कल्याण अधिकारी धर्मशीला के साथ भंगरोटू वृद्ध आश्रम का दौरा किया। प्रमिला से संवेदनशीलता के साथ बातचीत की गई। कोशिश थी कि उनकी यादों में छिपे किसी भी ऐसे संकेत को समझा जाए, जो उन्हें उनके घर तक ले जा सके। एक नाम, एक जगह, भाषा का एक शब्द या कोई छोटी-सी पहचान सब कुछ महत्वपूर्ण था। प्रमिला की बातचीत के छोटे वीडियो सबिता चंदा और इंडिया केयर्स के साथ साझा किए गए। इसके बाद ओडिशा में तलाश को आगे बढ़ाने के लिए वहां की पुलिस से भी सहयोग लिया गया।
सबिता चंदा ने ओडिशा रेलवे पुलिस एवं कोस्टल सिक्योरिटी के एडीजी अरुण बोथरा से संपर्क किया। अमित कुमार मलिक ने भी सुरागों के सत्यापन में सहयोग किया। प्रणय राउत और राजा मलिक समेत कई लोगों ने अलग-अलग चरणों में जानकारी जुटाने में मदद की। धीरे-धीरे बिखरे हुए सुराग एक-दूसरे से जुड़ने लगे। फिर वह खबर मिली, जिसका इंतजार था प्रमिला के परिवार का पता चल गया था।
35 साल बाद मोबाइल स्क्रीन पर लौट आया अपना घर
रविवार का दिन प्रमिला के लिए शायद जिंदगी के सबसे भावुक दिनों में से एक रहा होगा। वीडियो कॉल शुरू हुई। स्क्रीन पर अपने लोग थे। वही लोग, जिनसे जिंदगी ने उन्हें करीब 35 साल पहले अलग कर दिया था। कितनी बातें होंगी जो इन 35 वर्षों में कही नहीं जा सकीं। कितने सवाल होंगे जिनका जवाब नहीं मिला। कितनी यादें होंगी जो समय के साथ धुंधली पड़ गईं। लेकिन उस पल शायद किसी सवाल की जरूरत नहीं थी। आवाज पहचानने के लिए कभी-कभी शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। सामने परिवार था और सामने प्रमिला। वर्षों का फासला एक मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गया। परिवार के सदस्यों की आंखों में खुशी के आंसू थे। प्रमिला के लिए भी यह सिर्फ परिवार से बातचीत नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान और अपने अतीत के एक हिस्से से दोबारा जुड़ने का पल था।
एक टैटू, कुछ यादें और 35 साल का इंतजार
प्रमिला की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि परिवार तक पहुंचने का रास्ता किसी बड़े दस्तावेज या पूरी तरह स्पष्ट जानकारी से नहीं, बल्कि एक छोटे-से टैटू और कुछ बिखरी हुई यादों से खुला। कटक का नाम, ओडिशा से जुड़ी बातें और बांह पर लिखे ओड़िया अक्षर। इन संकेतों को जोड़ते हुए तलाश आगे बढ़ी। कभी-कभी जिंदगी में कोई निशानी कितनी बड़ी बन सकती है, प्रमिला की कहानी इसका उदाहरण है। बांह पर बना वह टैटू शायद वर्षों पहले सिर्फ एक निशान रहा होगा। लेकिन जब परिवार की तलाश शुरू हुई तो वही निशान उन्हें उनके अपनों तक ले जाने वाली कड़ी बन गया।
रिकॉर्ड में दर्ज नाम से आगे भी होती है एक इंसान की पहचान
प्रमिला की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी संस्थागत रिकॉर्ड में दर्ज नाम किसी व्यक्ति की पूरी कहानी नहीं होता। कागज पर वह कहीं रामकली मलिक थीं, कहीं किसी संस्था की निवासी, लेकिन उन सभी पहचान के पीछे एक ऐसी महिला थीं, जिनका भी एक घर था, परिवार था और अपने लोगों से जुड़ी यादें थीं।
35 साल का समय बहुत लंबा होता है। इस दौरान जिंदगी कई मोड़ ले सकती है। लोग बदल सकते हैं, जगहें बदल सकती हैं और यादें भी धुंधली हो सकती हैं। लेकिन रिश्तों की तलाश शायद कभी खत्म नहीं होती। प्रमिला और उनके परिवार की यह मुलाकात उसी उम्मीद की कहानी है। एक टैटू से शुरू हुई तलाश परिवार तक पहुंची और 35 साल से बंद एक रिश्ते का दरवाजा फिर खुल गया और शायद इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यही है कि इतने वर्षों बाद जब प्रमिला ने अपने परिवार की आवाज सुनी, तो उनके बीच की दूरी को न कोई सीमा रोक सकी, न कोई रिकॉर्ड, न बीते हुए साल। बस एक छोटी-सी मोबाइल स्क्रीन थी... और उस स्क्रीन के दूसरी तरफ था अपना परिवार।
प्रमिला की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि परिवार तक पहुंचने का रास्ता किसी बड़े दस्तावेज या पूरी तरह स्पष्ट जानकारी से नहीं, बल्कि एक छोटे-से टैटू और कुछ बिखरी हुई यादों से खुला। कटक का नाम, ओडिशा से जुड़ी बातें और बांह पर लिखे ओड़िया अक्षर। इन संकेतों को जोड़ते हुए तलाश आगे बढ़ी। कभी-कभी जिंदगी में कोई निशानी कितनी बड़ी बन सकती है, प्रमिला की कहानी इसका उदाहरण है। बांह पर बना वह टैटू शायद वर्षों पहले सिर्फ एक निशान रहा होगा। लेकिन जब परिवार की तलाश शुरू हुई तो वही निशान उन्हें उनके अपनों तक ले जाने वाली कड़ी बन गया।
रिकॉर्ड में दर्ज नाम से आगे भी होती है एक इंसान की पहचान
प्रमिला की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी संस्थागत रिकॉर्ड में दर्ज नाम किसी व्यक्ति की पूरी कहानी नहीं होता। कागज पर वह कहीं रामकली मलिक थीं, कहीं किसी संस्था की निवासी, लेकिन उन सभी पहचान के पीछे एक ऐसी महिला थीं, जिनका भी एक घर था, परिवार था और अपने लोगों से जुड़ी यादें थीं।
35 साल का समय बहुत लंबा होता है। इस दौरान जिंदगी कई मोड़ ले सकती है। लोग बदल सकते हैं, जगहें बदल सकती हैं और यादें भी धुंधली हो सकती हैं। लेकिन रिश्तों की तलाश शायद कभी खत्म नहीं होती। प्रमिला और उनके परिवार की यह मुलाकात उसी उम्मीद की कहानी है। एक टैटू से शुरू हुई तलाश परिवार तक पहुंची और 35 साल से बंद एक रिश्ते का दरवाजा फिर खुल गया और शायद इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यही है कि इतने वर्षों बाद जब प्रमिला ने अपने परिवार की आवाज सुनी, तो उनके बीच की दूरी को न कोई सीमा रोक सकी, न कोई रिकॉर्ड, न बीते हुए साल। बस एक छोटी-सी मोबाइल स्क्रीन थी... और उस स्क्रीन के दूसरी तरफ था अपना परिवार।