एक्सप्लेनर: बैंक में नकद जमा करने वाले रखें ध्यान, पैसों का स्रोत न बता पाने पर लगेगा टैक्स व जुर्माना
बैंक में नकदी जमा करने पर पैसों का स्रोत बताना अनिवार्य है। आयकर अपीलेट ट्रिब्यूनल के फैसले के अनुसार, स्रोत न बताने पर 84 फीसदी तक कर और जुर्माना लग सकता है। करदाताओं को नकदी बिक्री के बीजक और बैंक अभिलेख सुरक्षित रखने चाहिए।
विस्तार
मौजूदा दौर में अगर कोई समझता है कि बैंक में नकद जमा करने के बाद सिर्फ कच्चे पर्चे देकर बचा जा सकता है, तो उसे आयकर अपीलेट ट्रिब्यूनल की पणजी बेंच का ताजा फैसला पढ़ना चाहिए। आभूषण निर्माण और सोने की बिक्री कारोबार से जुड़ीं सलमा महमादसलीम दफेदार ने नोटबंदी की घोषणा के दो दिन बाद 10 नवंबर 2016 को अपने बैंक खाते में एकमुश्त 32 लाख रुपये जमा किए। असेसिंग ऑफिसर ने पड़ताल के बाद करदाता के पास मौजूद 4.66 लाख के पुराने कैश बैलेंस, 6.51 लाख की सोने की बिक्री और 1.67 लाख की डिपॉजिट मैच्योरिटी को तो वैध माना, लेकिन बाकी बचे 19.15 लाख को अघोषित आय मान लिया।
आईटीएटी ट्रिब्यूनल का कड़ा रुख
3 सितंबर 2026 को सुनाए गए फैसले में ट्रिब्यूनल ने कानूनी अंतर बहुत स्पष्ट कर दिया। करदाता ने 8.37 लाख रुपये की रकम को दुकान पर सोने की नकद बिक्री बताते हुए इसके समर्थन में कैश मेमो पेश किए थे। ट्रिब्यूनल ने इसे सिरे से खारिज कर दिया, क्योंकि इन कैश मेमो पर न तो ग्राहकों के नाम थे, न पते और न ही खरीदारों की कोई लिखित पुष्टि। ट्रिब्यूनल ने दो टूक कहा कि बिना ग्राहक की पहचान वाले अज्ञात पर्चे पैसे का वैध स्रोत साबित नहीं कर सकते। अंततः पुख्ता सबूतों के अभाव में करदाता को टैक्स चुकाना पड़ा।
करदाताओं के लिए जरूरी सबक
- नकद बिक्री पर इनवॉइस में ग्राहक का नाम, संपर्क व रजिस्टर में स्पष्ट आवक-जावक दर्ज रखें।
- पक्का बिल, पेमेंट वाउचर और शुद्धता का अधिकृत ब्योरा संभाल कर रखें।
- रिश्तेदारों से नकद लेते समय उनकी वित्तीय हैसियत व आईटीआर/बैंक रिकॉर्ड का प्रमाण पास रखें।
- पूर्व में निकाले गए कैश को दोबारा जमा करते समय यह तार्किक आधार होना चाहिए कि वह पैसा इतने दिनों तक घर में क्यों रखा रहा।
स्रोत साबित न होने पर कितना लगेगा टैक्स?
यदि बैंक में जमा नकदी स्रोत पेश नहीं किया जाता, तो असेसिंग ऑफिसर इसे धारा 68 (कैश क्रेडिट) या धारा 69ए (अघोषित नकदी) के तहत जोड़ देता है। इस पर धारा 115बीबीई के सख्त नियम लागू होते हैं:
- अघोषित आय पर सीधे 60% टैक्स लगता है, जिस पर कोई बेसिक छूट सीमा नहीं मिलती।
- टैक्स की रकम पर 25% सरचार्ज (कुल आय का 15%) और फिर 4% सेस जुड़ता है, जिससे कुल प्रभावी टैक्स देनदारी 78% हो जाती है।
- यदि विभाग स्वयं जांच में यह गड़बड़ी पकड़ता है, तो धारा 271एएसी के तहत 10 फीसदी पेनल्टी लग सकती है। इस तरह कुल देनदारी लगभग 84 फीसदी तक पहुंच जाती है, जिसके ऊपर धारा 234ए/बी/सी का ब्याज अलग से लगता है।
- इस रकम पर 80सी, 80डी जैसे कर दावों या कारोबारी नुकसान को समायोजित करने की अनुमति नहीं होती।