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मोती बाग हादसा: जर्जर इमारतें, बढ़ती भीड़ और लापरवाह सिस्टम; सत्य निकेतन हादसे ने खोली सरकारी लापरवाही की पोल

Sun, 06 Sep 2026 10:19 PM IST
विकास कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

किराया कमरे का नहीं, बेड का है। सुविधाओं की सूची लंबी है, लेकिन सुरक्षा की सूची कहां है? भवन की संरचनात्मक मजबूती, फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, बिजली के तार और एक कमरे में रहने वाले छात्रों की संख्या जैसे सवाल अक्सर पीजी के चमकदार विज्ञापनों के पीछे छिप जाते हैं।
 
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Delhi building collapse - फोटो : PTI
दिल्ली में पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों के लिए कॉलेज-कैंपस के आसपास पीजी अब जरूरत से ज्यादा कमाई का कारोबार बनते जा रहे हैं। हॉस्टलों में सीटें सीमित हैं, जबकि बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या लगातार बड़ी है। ऐसे में छात्रों के पास पीजी या किराए के कमरे का सहारा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर संचालक एक बेड के लिए 12 से 20 हजार रुपये तक किराया वसूल रहे हैं। सुविधाएं बढ़ीं तो किराया 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन इतने महंगे किराए के बदले सुरक्षित छत मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं।
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दूसरी इमारत से हादसा देखती छात्राएं - फोटो : PTI
इस फॉर्मूले पर चल रहा पीजी का कारोबार
दिल्ली में पीजी का कारोबार शायद इसी फॉर्मूले पर चल रहा है-पैसा पूरा दो, सुविधाओं की सूची देखो, लेकिन सुरक्षा की न पूछो यार। सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना ने पीजी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा का सवाल फिर सामने ला दिया है। मलबे में छात्रों के दबे होने की आशंका और हादसे के दौरान कुछ लोगों के फोन से मदद मांगने की जानकारी ने चिंता बढ़ाई है। सवाल यह है कि जिस पीजी में रहने के लिए छात्र हर महीने हजारों रुपये दे रहे हैं, वहां उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
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दूसरी इमारत से हादसा देखते छात्र - फोटो : PTI
पीजी का बाजार फल-फूल रहा
नॉर्थ कैंपस से मुखर्जी नगर और करोल बाग तक छात्रों की इसी मजबूरी पर पीजी का बाजार फल-फूल रहा है। एक कमरे में दो-तीन बेड लगाकर हर छात्र से अलग किराया लिया जाता है। नॉन-एसी कमरे में एक बेड का किराया 10 से 15 हजार और एसी कमरे में 15 से 20 हजार रुपये तक है। जिम, वाई-फाई, साइबर कैफे, इंडोर गेम और सिक्योरिटी गार्ड जैसी सुविधाओं के नाम पर किराया 20 हजार से ऊपर भी पहुंच जाता है।

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Delhi building collapse - फोटो : PTI
किराया कमरे का नहीं बेड का
यानी किराया कमरे का नहीं, बेड का है। सुविधाओं की सूची लंबी है, लेकिन सुरक्षा की सूची कहां है? भवन की संरचनात्मक मजबूती, फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, बिजली के तार और एक कमरे में रहने वाले छात्रों की संख्या जैसे सवाल अक्सर पीजी के चमकदार विज्ञापनों के पीछे छिप जाते हैं।
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Delhi building collapse - फोटो : PTI
हॉस्टल की चार हजार सीट, जरूरत 70,000 से ज्यादा की
अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर करीब 70 हजार सीटें हैं। इनमें बड़ी संख्या बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों की है। यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर से बड़ी संख्या में विद्यार्थी दिल्ली आते हैं। इसके मुकाबले करीब 20 कॉलेज हॉस्टलों में लगभग चार हजार सीटें ही उपलब्ध हैं। जाहिर है, बाकी छात्रों के लिए पीजी ही सहारा हैं। यही कमी पीजी संचालकों के लिए बड़ा बाजार और छात्रों के लिए महंगे किराए की मजबूरी बन गई है।
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Delhi building collapse - फोटो : PTI
कैंपस के पास कमरा यानी ज्यादा किराया
नॉर्थ कैंपस के आसपास हडसन लेन, विजय नगर, किंग्सवे कैंप, मुखर्जी नगर, क्रिश्चियन कॉलोनी, ईश्वर कॉलोनी, गुप्ता कॉलोनी, जवाहर नगर, चंद्रावल, कमला नगर और नेहरू विहार में बड़ी संख्या में पीजी हैं। दक्षिण दिल्ली में कटवरिया सराय, कालू सराय, आईएनए, गौतम नगर, मुनिरका, नेब सराय और जामिया-ओखला क्षेत्र छात्रों के प्रमुख ठिकाने हैं। लक्ष्मी नगर, प्रीत विहार और करोल बाग में भी छात्र बड़ी संख्या में रहते हैं।

कैंपस से दूरी बढ़ने पर किराया कुछ कम हो सकता है, लेकिन आने-जाने का खर्च और समय बढ़ जाता है। इसलिए छात्र महंगा पीजी चुनने को मजबूर होते हैं। संचालकों के लिए यह मजबूरी लगातार कमाई का जरिया बनी हुई है।
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Delhi building collapse - फोटो : PTI
राजेंद्र नगर हादसे के बाद हरकत में आई सरकार, लेकिन जमीन पर कुछ भी नहीं
जुलाई 2024 के राजेंद्र नगर कोचिंग बेसमेंट हादसे के बाद पीजी, कोचिंग संस्थानों और बेसमेंट की सुरक्षा सुधारने को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार ने कई घोषणाएं कीं। इसके बावजूद दो साल बाद भी पीजी के लिए अलग और एकीकृत फायर एवं स्ट्रक्चरल सेफ्टी कोड लागू नहीं हो सका है। पीजी की वैधता और सुरक्षा अलग-अलग भवन उपनियमों, मास्टर प्लान, अग्निशमन नियमों और स्थानीय निकायों की मंजूरियों में बंटी हुई है। डीडीए अभी यूबीबीएल-2016 को भवन अनुमोदन का आधार बता रहा है, जबकि दिल्ली फायर सेवा फायर सेफ्टी नियम, 2010 और उनके 2025 के संशोधनों के तहत काम कर रही है।
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Delhi building collapse - फोटो : PTI
हादसे के बाद बड़ा सवाल : पीजी में सुरक्षा की जांच कौन करेगा?
सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली के उन सैकड़ों पीजी और किराये के कमरों की निगरानी पर सवाल खड़ा कर दिया है, जहां छात्रों से हर महीने हजारों रुपये लिए जा रहे हैं। क्या इन इमारतों की नियमित जांच होती है? क्या संरचनात्मक मजबूती का रिकॉर्ड देखा जाता है? क्या एक कमरे में तय क्षमता से ज्यादा छात्रों को रखने पर कार्रवाई होती है? फायर सेफ्टी और आपातकालीन निकास की व्यवस्था है या नहीं, आपदा के समय छात्र सुरक्षित बाहर निकल सकते हैं या नहीं-इन सवालों का जवाब कौन देगा?
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