ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी नाँ
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी नाँ
दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी नाँ
हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझ में ऐसे आन बसे हो त...और पढ़ें
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
- अहमद फ़राज़
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र ...और पढ़ें
बस एक बार फ़लक से इशारा हो जाए
फिर उस के बा'द भले जो ख़सारा हो जाए
अजब फ़ज़ा है कि तहक़ीक़ उस पे है मौक़ूफ़
जो हो चुका है वो हम से दोबारा हो जाए
हथेलियों से हलक़ में उतरता जाम-विसाल
किसी...और पढ़ें
अब लगने लगी मुझ को भी बे-कार ये दुनिया
हर मोड़ पे जैसे कि हो दीवार ये दुनिया
डरते हैं इसी बात से हम अहल-ए-वफ़ा लोग
हम को न समझ ले कहीं ग़द्दार ये दुनिया
सींची है ज़मीं लोगों ने बच्चों के लहू से...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें
मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ
जनम-दिन है अकेला रो रहा हूँ
किसी ने झाँक कर देखा न दिल में
कि मैं अंदर से कैसा हो रहा हूँ
जो दिल पर दाग़ हैं पिछली रुतों के
उन्हें अब आँसुओं से धो रहा हूँ
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जिस को चाहा बस उसी ने ग़म दिया
मुझ को मेरी हर ख़ुशी ने ग़म दिया
मैं तुम्हें ही याद कर के रो पड़ा
जब सफ़र में अजनबी ने ग़म दिया
क्या बचा है अब यक़ीं किस पर करूँ
ज़िंदगी को ज़िंदगी ने ग़म दिया...और पढ़ें
कठिन तन्हाइयों से कौन खेला मैं अकेला
भरा अब भी मिरे गाँव का मेला मैं अकेला
बिछड़ कर तुझ से मैं शब भर न सोया कौन रोया
ब-जुज़ मेरे ये दुख भी किस ने झेला मैं अकेला
ये बे-आवाज़ बंजर बन के बासी ये उदासी...और पढ़ें
बोल पड़ते हैं हम जो आगे से
प्यार बढ़ता है इस रवय्ये से
मैं वही हूँ यक़ीं करो मेरा
मैं जो लगता नहीं हूँ चेहरे से
हम को नीचे उतार लेंगे लोग
इश्क़ लटका रहेगा पंखे से
सारा कुछ लग र...और पढ़ें
अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें