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Kanpur News: बीए आउट ऑफ ट्रेंड, बीएससी ने महाविद्यालयों को संभाला
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कानपुर। यह दोनों केस तो बानगी भर हैं। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) से संबद्ध महाविद्यालयों में दाखिले का संकट इस साल भी गहराता नजर आ रहा है। विवि से जुड़े करीब 600 कॉलेजों में पांच महीने बाद भी बड़ी संख्या में सीटें खाली हैं। सबसे अधिक असर ग्रामीण अंचल के सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में संचालित बीए पाठ्यक्रम पर पड़ा है। इसके मुकाबले बीएससी में छात्रों की रुचि बनी हुई है। निजी के अलावा अनुदानित कॉलेजों का भी यही हाल है।
उत्तर प्रदेश महाविद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय त्रिवेदी के मुताबिक, इस साल करीब 90 हजार सीटें खाली रह गई हैं। मालूम हो कि यूपी बोर्ड का परिणाम जारी होने के साथ ही विवि में अप्रैल में दाखिलों की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पांच महीने का समय हो गया लेकिन कई कॉलेज सीटें भरने में नाकाम ही रहे। निजी महाविद्यालयों के आगे तो आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। कारण पिछले 23 सालों से उन्होंने अपनी फीस में इजाफा नहीं किया है। जो दाखिले हुए भी है वह बीएससी में हो रहे हैं।
बीए में 360 में सिर्फ 27 दाखिले
कानपुर देहात के रामऔतार कॉलेज में बीएससी की 240 सीटों में 175 छात्रों ने दाखिला लिया है, जबकि बीए की 360 सीटों में महज 27 प्रवेश हुए हैं। कॉलेज से जुड़े नरेंद्र सिंह ने बताया कि शिक्षकों के प्रयास के बाद भी बीए में दाखिलों की स्थिति बेहद कमजोर है। बीएससी में हुए प्रवेश से कॉलेज को कुछ राहत मिली है।
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कभी वेटिंग, अब 27.77 फीसदी प्रवेश
शहर के महिला महाविद्यालय में केवल बीए का पाठ्यक्रम संचालित होता है। कभी दाखिले के लिए यहां पर लंबी कतार और वेटिंग रहती थी, लेकिन इस बार 900 सीटों में अब तक सिर्फ 250 प्रवेश हुए हैं। यानी करीब 27.77 फीसदी सीटें ही भर सकी हैं।
विवि ने दिए ये सुझाव
दाखिले बढ़ाने के लिए कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कॉलेजों को रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू करने, रोजगार मेले आयोजित करने, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने और रील्स व शॉर्ट वीडियो के जरिये कॉलेजों का प्रचार करने का सुझाव दिया था। कुछ कॉलेजों ने इन पर काम भी किया, लेकिन खाली सीटों की समस्या में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
क्या है कारण
-शहर से बाहर जाकर पढ़ने का भी ट्रेंड बढ़ा है। अब अगर किसी छात्र को पारंपरिक बीए भी करना है तो उसकी पहली प्राथमिकता दिल्ली यूनिवर्सिटी रहती है।
-पढ़ाई के ट्रेंड में बदलाव आ रहा है। छात्र नौकरी की चाहत के कारण महंगे कॉलेज से प्रोफेशनल कोर्स करने से नहीं हिचकते।
-पारंपरिक कोर्स को चला रहे कॉलेजों ने इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कोई बदलाव नहीं किया है। छात्र अब कैंपस को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
-पढ़ाई के बाद नौकरी करने की इच्छा रखने वाले छात्रों को परंपरागत कोर्स से लाभ मिलता नहीं दिखता। बीए के बजाए बीसीए, बीबीए करने के बाद कई छात्र अच्छे पैकेज पर नौकरी कर रहे हैं।
-बीए के संगीत, फाइन आर्ट्स, इतिहास, अंग्रेजी, हिंदी के साथ दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल, संस्कृत और गृहविज्ञान जैसे विषयों में छात्र संख्या बेहद कम है।
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उत्तर प्रदेश महाविद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय त्रिवेदी के मुताबिक, इस साल करीब 90 हजार सीटें खाली रह गई हैं। मालूम हो कि यूपी बोर्ड का परिणाम जारी होने के साथ ही विवि में अप्रैल में दाखिलों की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पांच महीने का समय हो गया लेकिन कई कॉलेज सीटें भरने में नाकाम ही रहे। निजी महाविद्यालयों के आगे तो आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। कारण पिछले 23 सालों से उन्होंने अपनी फीस में इजाफा नहीं किया है। जो दाखिले हुए भी है वह बीएससी में हो रहे हैं।
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बीए में 360 में सिर्फ 27 दाखिले
कानपुर देहात के रामऔतार कॉलेज में बीएससी की 240 सीटों में 175 छात्रों ने दाखिला लिया है, जबकि बीए की 360 सीटों में महज 27 प्रवेश हुए हैं। कॉलेज से जुड़े नरेंद्र सिंह ने बताया कि शिक्षकों के प्रयास के बाद भी बीए में दाखिलों की स्थिति बेहद कमजोर है। बीएससी में हुए प्रवेश से कॉलेज को कुछ राहत मिली है।
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कभी वेटिंग, अब 27.77 फीसदी प्रवेश
शहर के महिला महाविद्यालय में केवल बीए का पाठ्यक्रम संचालित होता है। कभी दाखिले के लिए यहां पर लंबी कतार और वेटिंग रहती थी, लेकिन इस बार 900 सीटों में अब तक सिर्फ 250 प्रवेश हुए हैं। यानी करीब 27.77 फीसदी सीटें ही भर सकी हैं।
विवि ने दिए ये सुझाव
दाखिले बढ़ाने के लिए कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कॉलेजों को रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू करने, रोजगार मेले आयोजित करने, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने और रील्स व शॉर्ट वीडियो के जरिये कॉलेजों का प्रचार करने का सुझाव दिया था। कुछ कॉलेजों ने इन पर काम भी किया, लेकिन खाली सीटों की समस्या में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
क्या है कारण
-शहर से बाहर जाकर पढ़ने का भी ट्रेंड बढ़ा है। अब अगर किसी छात्र को पारंपरिक बीए भी करना है तो उसकी पहली प्राथमिकता दिल्ली यूनिवर्सिटी रहती है।
-पढ़ाई के ट्रेंड में बदलाव आ रहा है। छात्र नौकरी की चाहत के कारण महंगे कॉलेज से प्रोफेशनल कोर्स करने से नहीं हिचकते।
-पारंपरिक कोर्स को चला रहे कॉलेजों ने इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कोई बदलाव नहीं किया है। छात्र अब कैंपस को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
-पढ़ाई के बाद नौकरी करने की इच्छा रखने वाले छात्रों को परंपरागत कोर्स से लाभ मिलता नहीं दिखता। बीए के बजाए बीसीए, बीबीए करने के बाद कई छात्र अच्छे पैकेज पर नौकरी कर रहे हैं।
-बीए के संगीत, फाइन आर्ट्स, इतिहास, अंग्रेजी, हिंदी के साथ दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल, संस्कृत और गृहविज्ञान जैसे विषयों में छात्र संख्या बेहद कम है।