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Ambedkar Nagar News: मानसिक दबाव बढ़ा, एक वर्ष में 56 ने दी जान

Wed, 09 Sep 2026 10:47 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 09 Sep 2026 10:47 PM IST
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Mental pressure increased, 56 people took their lives in a year
अंबेडकरनगर। आत्महत्या किसी एक क्षण या मामूली विवाद का नतीजा नहीं होती। इसके पीछे लंबे समय से चला आ रहा तनाव, अवसाद, अकेलापन, आर्थिक परेशानी, रिश्तों में खटास या असफलता की भावना हो सकती है। कई बार छोटी घटना पहले से मानसिक दबाव झेल रहे व्यक्ति के लिए अंतिम ट्रिगर बन जाती है। अंबेडकरनगर में इस साल अब तक विभिन्न कारणों से 56 लोगों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। वहीं महामाया राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर में रोजाना औसतन एक से दो आत्महत्या के प्रयास से जुड़े मामले पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञ इसे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर स्थिति मान रहे हैं।
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भागदौड़ के बीच बढ़ रहा अकेलापन
मनोचिकित्सकों के मुताबिक नौकरी का दबाव, आर्थिक असुरक्षा, कर्ज, परिवार से दूरी, रिश्तों में बदलाव, अकेलापन, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और आगे निकलने की होड़ मानसिक दबाव बढ़ा रही है। कई बार बाहर से सामान्य नजर आने वाला व्यक्ति भीतर ही भीतर गंभीर भावनात्मक संकट से गुजर रहा होता है। खासकर 18 से 45 वर्ष की उम्र में तनाव और मानसिक परेशानी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
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विवाद या डांट हो सकती है ट्रिगर
विशेषज्ञों का कहना है कि पति-पत्नी का विवाद, माता-पिता की डांट, परीक्षा में असफलता या रिश्तों में तनाव सामान्य स्थिति में आत्महत्या का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। लेकिन पहले से अवसाद, निराशा, अकेलेपन या मानसिक दबाव से जूझ रहे व्यक्ति पर ऐसी घटना का असर गंभीर हो सकता है। इसलिए किसी की असामान्य प्रतिक्रिया को केवल जिद, गुस्सा या भावुकता मानकर टालना ठीक नहीं है।
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यदि कोई व्यक्ति बार-बार जीवन को लेकर निराशा जताए, खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे, अचानक लोगों से दूरी बनाने लगे, पसंदीदा गतिविधियों से किनारा कर ले या लगातार बेचैन और निराश दिखाई दे तो परिवार को सतर्क होना चाहिए। नींद और खानपान में अचानक बड़ा बदलाव भी संकेत हो सकता है।
सीधे पूछने से नहीं बढ़ता खतरा
महामाया राजकीय मेडिकल कॉलेज सद्दरपुर की मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. पारुल यादव ने बताया कि किसी व्यक्ति के व्यवहार से आत्महत्या का खतरा महसूस हो तो उससे शांत तरीके से सीधे पूछा जा सकता है कि क्या उसके मन में खुद को नुकसान पहुंचाने का विचार आ रहा है। इससे उसके मन में ऐसा विचार पैदा नहीं होता, बल्कि उसे अपनी परेशानी साझा करने का अवसर मिलता है। संकट की स्थिति में व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और भरोसेमंद व्यक्ति के साथ रखें। जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या तत्काल चिकित्सा सहायता लें।

डांट और तुलना से बचें, बात सुनें
मनोरोग कार्यक्रम के प्रभारी व डिप्टी सीएमओ डॉ. आशुतोष सिंह ने बताया कि आत्महत्या की रोकथाम में परिवार की भूमिका सबसे अहम है। हर समस्या का समाधान डांट, तुलना या दबाव नहीं हो सकता। बच्चों और बड़ों की बात बिना टोके और बिना निर्णय सुनाए सुनना जरूरी है। उनकी परेशानी को गंभीरता से लेने के साथ जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने में भी झिझक नहीं होनी चाहिए। परिवार का माहौल ऐसा हो कि संकट की स्थिति में व्यक्ति खुद को अकेला महसूस न करे।
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