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Shimla News: हिमालयी विरासत के विविध रंगों पर शोधकर्ताओं ने किया मंथन
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हिमाचल प्रदेश राज्य संग्रहालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेते विद्यार्थी और शोधार्थी
राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन तीन तकनीकी सत्रों में शोधकर्ताओं ने प्रस्तुत किए 13 शोध-पत्र
जेंडर, समाज, अनुष्ठान और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत जैसे विषयों पर हुआ विमर्श
हिमालयी संस्कृति की निरंतरता और बदलती सामाजिक परिस्थितियों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल राज्य संग्रहालय शिमला में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन हिमालयी विरासत के पक्षों पर गहन अकादमिक मंथन हुआ। दिनभर आयोजित तीन तकनीकी सत्रों में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए शोधकर्ताओं ने 13 शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
शोध-पत्रों में हिमालयी कला, वास्तुकला, दृश्य संस्कृति, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, अनुष्ठान और लोक परंपराओं के साथ जेंडर, समाज तथा सांस्कृतिक व्याख्या जैसे विषय शामिल रहे। सत्रों में हिमालयी समाज और संस्कृति को केवल इतिहास के नजरिये से देखने के बजाय कला, स्थापत्य, लोक स्मृति, अनुष्ठानों, परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं के व्यापक संदर्भ में समझने पर जोर दिया गया।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन और क्षेत्रीय अनुभवों के आधार पर हिमालयी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न रूपों और समय के साथ उनमें आए बदलावों को सामने रखा। शोध-पत्रों की प्रस्तुतियों के बाद विषय विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के बीच प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। इसमें हिमालयी संस्कृति की निरंतरता, बदलती सामाजिक परिस्थितियों और परंपराओं के संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
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संगोष्ठी में स्थानीय विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी की। आरकेएमवी कॉलेज शिमला, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस राजकीय महाविद्यालय संजौली और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों व शोधार्थियों ने अलग-अलग सत्रों में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में भाषा एवं संस्कृति विभाग के अतिरिक्त निदेशक चंदन कपूर, राज्य संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. हरि चौहान, नरेंद्र कुमार, गगन खन्ना, विकास बन्याल और नीरज ठाकुर सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे।
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जेंडर, समाज, अनुष्ठान और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत जैसे विषयों पर हुआ विमर्श
हिमालयी संस्कृति की निरंतरता और बदलती सामाजिक परिस्थितियों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल राज्य संग्रहालय शिमला में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन हिमालयी विरासत के पक्षों पर गहन अकादमिक मंथन हुआ। दिनभर आयोजित तीन तकनीकी सत्रों में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए शोधकर्ताओं ने 13 शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
शोध-पत्रों में हिमालयी कला, वास्तुकला, दृश्य संस्कृति, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, अनुष्ठान और लोक परंपराओं के साथ जेंडर, समाज तथा सांस्कृतिक व्याख्या जैसे विषय शामिल रहे। सत्रों में हिमालयी समाज और संस्कृति को केवल इतिहास के नजरिये से देखने के बजाय कला, स्थापत्य, लोक स्मृति, अनुष्ठानों, परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं के व्यापक संदर्भ में समझने पर जोर दिया गया।
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शोधकर्ताओं ने अध्ययन और क्षेत्रीय अनुभवों के आधार पर हिमालयी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न रूपों और समय के साथ उनमें आए बदलावों को सामने रखा। शोध-पत्रों की प्रस्तुतियों के बाद विषय विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के बीच प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। इसमें हिमालयी संस्कृति की निरंतरता, बदलती सामाजिक परिस्थितियों और परंपराओं के संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
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संगोष्ठी में स्थानीय विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी की। आरकेएमवी कॉलेज शिमला, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस राजकीय महाविद्यालय संजौली और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों व शोधार्थियों ने अलग-अलग सत्रों में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में भाषा एवं संस्कृति विभाग के अतिरिक्त निदेशक चंदन कपूर, राज्य संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. हरि चौहान, नरेंद्र कुमार, गगन खन्ना, विकास बन्याल और नीरज ठाकुर सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे।