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हिमाचल: एनएलयू के दीक्षांत समारोह में बोले सुक्खू- कमजोर वर्गों तक न्याय पहुंचाना ही इसका वास्तविक उद्देश्य

Sun, 11 Oct 2026 03:20 PM IST
Ankesh Dogra न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 11 Oct 2026 03:20 PM IST
सार

हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों तक न्याय सुनिश्चित करना है।

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NLU Shimla Third Convocation 2026 Sukhu Justice MM Sundresh
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू संबोधित करते हुए। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू), शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों तक न्याय सुनिश्चित करना है। लोकतंत्र में न्याय केवल न्यायिक आदेशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निष्पक्षता, विवेकशीलता और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है।

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मुख्यमंत्री ने कहा कि कानून और न्याय की सार्थकता तभी है, जब समाज के सबसे कमजोर वर्गों को भी न्याय मिलने की उम्मीद हो, जरूरतमंदों की आवाज सुनी जाए और प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों की सुरक्षा का भरोसा मिले। उन्होंने विधि स्नातकों से अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए करने का आह्वान किया।
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न्यायिक व्यवस्था और वित्तीय जिम्मेदारियों पर रखी बात
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार आम नागरिकों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध करवाने के लिए न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने न्यायपालिका को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि संविधान के तीनों अंगों का मूल उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।

उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं और पहलों के क्रियान्वयन में कुछ न्यायिक निर्णयों के कारण व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आती हैं। उन्होंने भर्ती नियमों और कर्मचारियों को वित्तीय लाभ देने से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ निर्णयों से राज्य के राजकोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
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मुख्यमंत्री ने वर्ष 2003 में अनुबंध कर्मचारियों को वरिष्ठता और वेतन वृद्धि का लाभ नहीं देने संबंधी सरकारी निर्णय का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लगभग दो दशक बाद न्यायालय ने भर्ती नियमों में स्पष्ट प्रावधान न होने के बावजूद वित्तीय लाभ देने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि कोई भी निर्वाचित सरकार अपने कर्मचारियों को उनके देय वित्तीय लाभों से वंचित नहीं रखना चाहती, लेकिन राज्य को अपने संसाधनों और राजकोषीय दायित्वों का भी ध्यान रखना पड़ता है। जनहित, नियमों और वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाए रखना शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

पहाड़ी राज्य में खेल मैदानों के उपयोग पर भी बोले मुख्यमंत्री
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पहाड़ी राज्य होने के कारण खेल मैदानों के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध करवाना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए स्कूलों और सामुदायिक खेल मैदानों के साझा उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने पहली बार स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के लिए पांच लाख रुपये की राशि का भुगतान किया। उच्च न्यायालय ने एक सरकारी स्कूल के खेल मैदान के उपयोग की अनुमति निर्धारित राशि के भुगतान की शर्त पर दी थी।

मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए सरकार की ओर से हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन भी दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों, विद्यार्थियों और सरकार के सामूहिक प्रयासों से एनएलयू शिमला को शिक्षा, विधि अनुसंधान और अकादमिक उत्कृष्टता का प्रमुख केंद्र बनाया जाएगा।
 

कानून के विद्यार्थी सामाजिक बदलाव के वाहक : न्यायमूर्ति सुंदरेश
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने कहा कि हिमाचल प्रदेश धरती पर स्वर्ग के समान है और समाज में विधि स्नातकों की विशिष्ट भूमिका है। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “लॉ के विद्यार्थी के रूप में आप दूसरों से अलग हैं। आप सोशल इंजीनियर, सोशल डॉक्टर और सोशल आर्किटेक्ट हैं।” उन्होंने कहा कि कानून और न्याय के प्रति सम्मान केवल कानूनी प्रावधानों की सैद्धांतिक समझ तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रभावी न्याय व्यवस्था के लिए ज्ञान, न्याय की गहरी भावना और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता आवश्यक है। 

कृत्रिम मेधा जैसी नई तकनीकों के लिए तैयार रहें विद्यार्थी
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने विद्यार्थियों को उभरती चुनौतियों के लिए तैयार रहने और विशेष रूप से कृत्रिम मेधा सहित नए क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा और कानूनी पेशे में भी महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे। विद्यार्थियों को तकनीकी प्रगति अपनाने, बदलाव के अनुरूप खुद को तैयार करने और लगातार सीखते रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि विधि के विद्यार्थियों को अपने ज्ञान को निरंतर बेहतर बनाना चाहिए और बदलती परिस्थितियों के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।

मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक, चार हस्तियों को मानद उपाधि
समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया ने स्नातक विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं।

इस अवसर पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, त्रिपुरा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस रामचंद्र राव और झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान को भी डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। दीक्षांत समारोह में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला की कुलपति डॉ. प्रीति सक्सेना, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
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