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अदालत: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- बिना वैध आरसी वाहन चलाना बीमा शर्तों का उल्लंघन, जानें पूरा मामला

Mon, 12 Oct 2026 10:15 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 12 Oct 2026 10:15 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्थायी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद वैध आरसी के बिना सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाना मोटर वाहन अधिनियम और बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। पढ़ें पूरी खबर...

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Himachal High Court Ankit Mahajan accident case invalid RC insurance compensation 1.01 crore
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में जान गंवाने वाले युवा वकील के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्थायी रजिस्ट्रेशन की अवधि समाप्त होने के बाद बिना वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र (आरसी) के सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाना मोटर वाहन अधिनियम का गंभीर उल्लंघन और बीमा पॉलिसी की शर्तों का मूलभूत उल्लंघन है। हालांकि, पीड़ित परिवार को राहत देते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि 72.67 लाख रुपये से बढ़ाकर लगभग 1.01 करोड़ रुपये कर दी है।

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कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह पहले दावेदार को मुआवजे का भुगतान करे और बाद में पे एंड रिकवर के तहत यह राशि गाड़ी की मालकिन से वसूल करे। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की ओर से 2014 में दायर अपील और मृतक की मां द्वारा दायर क्रॉस-ऑब्जेक्शन पर सुनवाई करते हुए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण चंबा के 2013 के आदेश में संशोधन किया। उल्लेखनीय है कि 22 जुलाई 2011 को खजियार-डलहौजी मार्ग पर दैनकुंड नाले के पास एक कार अनियंत्रित होकर खाई में गिर गई। कार में सवार 27 वर्षीय अंकित महाजन मौके पर ही मौत हो गई। 
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वह मुंबई की प्रसिद्ध लॉ फर्म में वकील थे। वाहन 10 जून 2011 को खरीदा गया था और इसका अस्थायी रजिस्ट्रेशन 9 जुलाई 2011 को समाप्त हो चुका था। 22 जुलाई (हादसे के दिन) तक वाहन का स्थायी पंजीकरण नहीं हुआ था। हालांकि वाहन स्वामी ने 19 जुलाई को आरएलए (आरएलए) चंबा में दस्तावेज जमा कराए थे। ट्रिब्यूनल ने मृतक की मां को 72,67,700 रुपये का मुआवजा मंजूर किया था और पूरी देनदारी बीमा कंपनी पर डाली थी। 

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वर्चुअल बैठक के फैसलों पर सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी, एसटीए का आदेश रद्द
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य परिवहन प्राधिकरण (एसटीए) के एक फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई सरकारी संस्था वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बैठक करती है, तो उस बैठक में लिए गए फैसले पर शामिल सभी सदस्यों के हस्ताक्षर होने जरूरी हैं। सिर्फ अध्यक्ष (चेयरमैन) और सचिव के दस्तखत से जारी किया गया आदेश कानूनन मान्य नहीं होगा। 

न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने याचिकाकर्ता आनंद मोदगिल की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया। हाईकोर्ट ने माना कि बिना सभी सदस्यों के हस्ताक्षर वाले आदेश की कोई कानूनी मान्यता नहीं है और इसे लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने 31 जनवरी 2025 के विवादित आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। इसके साथ ही एसटीए को निर्देश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ता के आवेदनों पर अगले चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से विचार करे और कानून के अनुसार आदेश पारित करे। 

अथॉरिटी को निर्देश दिया गया है कि वह मोटर वाहन अधिनियम की धारा 72(1) व 80 और हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णयों को ध्यान में रखकर ही अंतिम फैसला ले। याचिकाकर्ता ने शिमला-मनाली और शिमला-चंबा रूट के लिए स्टेज कैरिज परमिट प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। पूर्व में हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत 31 अगस्त 2025 को एसटीए चेयरमैन के कार्यालय में बैठक हुई थी, जिसमें चेयरमैन के अलावा मेंबर सेक्रेटरी सहित अन्य 5 सदस्य और याचिकाकर्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये भाग लिया था। 

एसटीए ने याचिकाकर्ता के आवेदनों को खारिज करने का आदेश जारी किया। याचिकाकर्ता ने फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह आदेश केवल चेयरमैन और मेंबर सेक्रेटरी की ओर से हस्ताक्षरित था। जबकि बैठक में शामिल अन्य सदस्यों के हस्ताक्षर इस पर नहीं थे। संवाद
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