राजस्थान: ट्राइबल बेल्ट में बीएपी की बढ़ती ताकत, कांग्रेस के गढ़ में सेंध की तैयारी; भाजपा के सामने नई चुनौती
राजस्थान निकाय चुनाव में बीएपी ने दक्षिणी राजस्थान में अपना दायरा बढ़ाया है। तीन गुना ज्यादा प्रत्याशियों के साथ पार्टी BJP-कांग्रेस को चुनौती देकर आदिवासी राजनीति मजबूत करने में जुटी है।
विस्तार
राजस्थान के निकाय चुनाव इस बार सिर्फ नगर निकायों की सत्ता का चुनाव नहीं हैं। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी बेल्ट में यह चुनाव बदलते राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा भी बन गया है। अलग भील प्रदेश की मांग को लेकर राजनीति करने वाली भारत आदिवासी पार्टी ने इस बार पिछले निकाय चुनाव के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। पार्टी की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
बांसवाड़ा-डूंगरपुर लंबे समय से कांग्रेस की मजबूत राजनीतिक जमीन माने जाते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां आदिवासी राजनीति का एक अलग राजनीतिक केंद्र तेजी से उभरा है। बीएपी अब इसी प्रभाव को विधानसभा और लोकसभा के बाद नगर निकायों के स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रही है।
63 वार्डों में उतारे प्रत्याशी, आगे बढ़ाने की रणनीति
BAP ने बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले की पांच नगर निकायों के 180 वार्डों में से 63 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं। बांसवाड़ा के 60 में से 20, गढ़ी के 25 में से 11, कुशलगढ़ के 20 में से 6, डूंगरपुर के 40 में से 12 और सागवाड़ा के 35 में से 14 वार्डों में पार्टी चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा उदयपुर, पाली, सिरोली, प्रतापढ़, सलूंबर में 80 से ज्यादा प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं।
बीएपी के संस्थापक एवं डूंगरपुर-बांसवाड़ा सांसद राजकुमार रोत का कहना है कि पिछले निकाय चुनावों में बीएपी ने लगभग 50 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे जबकि इस बार यह संख्या 150 के पास है। यह संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि BAP अब सिर्फ चुनिंदा आदिवासी सीटों पर चुनाव लड़ने के बजाय बड़े पैमाने पर स्थानीय चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।
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कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या?
दक्षिण राजस्थान में आदिवासी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से कांग्रेस के साथ रहा है। विधानसभा चुनावों में बीएपी के उभार के बाद इस वोट बैंक में बंटवारे की स्थिति पहले ही दिखाई दे चुकी है। अब निकाय चुनाव में बीएपी का विस्तार कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। खासकर उन वार्डों में जहां आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, वहां बीएपी की मौजूदगी कांग्रेस के पारंपरिक वोट में सेंध लगा सकती है।
हालांकि इसका फायदा सीधे भाजपा को मिलेगा, यह भी तय नहीं है। यदि बीएपी कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के वोट बैंक में भी सेंध लगाती है तो कई निकायों में मुकाबला और ज्यादा दिलचस्प हो सकता है।
पहली बार नए इलाकों में BJP-कांग्रेस से सीधा मुकाबला
इस बार बीएपी ने अपना दायरा बांसवाड़ा-डूंगरपुर तक सीमित नहीं रखा है। उदयपुर, पाली, सिरोही, प्रतापगढ़ और सलूंबर जैसे इलाकों में भी पार्टी पहली बार निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने सीधे मुकाबले में उतर रही है।
यानी बीएपी की रणनीति अब केवल आदिवासी बहुल विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं है। पार्टी स्थानीय निकायों के जरिए शहरों और कस्बों में संगठन खड़ा करना चाहती है।
यही वजह है कि इन चुनावों के नतीजों को बीएपी के भविष्य की राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निकाय चुनाव से आगे की राजनीति का टेस्टबीएपी के लिए ये चुनाव सीट जीतने से ज्यादा अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का मौका है। अगर पार्टी बड़ी संख्या में वार्डों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो आने वाले पंचायत और विधानसभा चुनावों के लिए उसे संगठन विस्तार का फायदा मिल सकता है।
दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव दक्षिण राजस्थान में अपने-अपने राजनीतिक आधार को परखने का मौका है। कांग्रेस के सामने अपना पारंपरिक आदिवासी जनाधार बचाने की चुनौती है, जबकि भाजपा बीएपी के उभार के बीच अपने विस्तार को मजबूत करने की कोशिश करेगी।
घोषणा पत्र से साफ होगी बीएपी की राजनीतिक दिशाबीएपी रविवार को अपना चुनावी घोषणापत्र जारी करने जा रही है। इस घोषणापत्र का सबसे अहम हिस्सा मेसा यानी मुनिसिपल एक्सटेंशन एक्ट रहेगा। सांसद रोत का कहना है कि सरकार ने आदिवासी बेल्ट में जिस तरह से नगर पालिकाओं का गठन किया है वह संविधान के अनुरूप नहीं है। नगर पालिका सीमा में जिन आदिवासियों की जमीनें आ रही हैं उन्हें उनका मालिकाना हक मिले। हम अपने घोषणापत्र में इसे भी शामिल करेंगे।