राखी का त्योहार, आंखों में आंसू: आतंकवाद ने छीने भाई, रक्षाबंधन पर छलक उठीं बहनों की आंखें; इंसाफ का इंतजार
1990 के आतंकवाद में भाइयों और परिजनों को खोने वाले कश्मीरी पंडित परिवारों का दर्द रक्षाबंधन पर फिर सामने आया। पीड़ित बहनें आज भी न्याय की आस लगाए हैं और पुरानी हत्याओं की फाइलें दोबारा खोलकर दोषियों को सजा देने की मांग कर रही हैं।
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रक्षाबंधन पर हर बहन अपने भाई की लंबी आयु की कामना करती है लेकिन कुछ बहनें ऐसी भी हैं जिनके भाइयों को आतंकवाद निगल गया। हर साल जब यह दिन आता है तो इनके जख्म हरे हो जाते हैं। इन बहनों की जुबां पर आज भी यही सवाल है कि जिन्होंने उनसे उनके भाई छीने हैं, उन्हें सजा कब मिलेगी।
जम्मू के लोअर रूपनगर क्वार्टरों में रह रहे कई कश्मीरी विस्थापित परिवार अपना दर्द सुनाते हुए रो पड़े। 1990 के दौर में आतंकी घटनाओं में अपने भाइयों और परिजन को खोने वाले परिवार इन जन्म में तो यह दर्द कभी भुला नहीं पाएंगे। रक्षाबंधन के मौके पर बहनों की आंखों में कश्मीरी पंडित भाइयों को याद करके आंसू आ जाते हैं।
ऊषा दत्ता ने नम आंखों से बताया कि उनके पति बलदेव राज श्रीनगर के पैलेडियम सिनेमा में प्रोजेक्टर रूम के इंचार्ज और हेड ऑपरेटर थे। उनके ही स्टाफ के माध्यम से उनका अपहरण 18 जनवरी 1991 को करवाया गया। बाद में जेकेएलएफ से जुड़े आतंकवादी प्रिंस सलीम ने 19 जनवरी को उनकी हत्या कर दी। उस समय शिकायत करने के बावजूद उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिली। आज तक परिवार को न सरकारी नौकरी मिली और न ही किसी कश्मीरी शरणार्थी संगठन ने मदद की।
बलदेव राज की बहन राज दुलारी पंजाब के गढ़शंकर में परिवार के साथ रहती हैं। रक्षाबंधन पर वह भाई के परिवार से मिलने आती हैं। उन्होंने कहा, हमें आज तक न्याय नहीं मिला। मेरे भाई के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए थी। सरकार उसे भी सजा दे जिसने हमसे हमारा भाई छीना।
ऊषा ने बताया कि जब उनके पति की हत्या की गई। उनके तीन छोटे बच्चे थे, जिनमें एक बेटी दिव्यांग थी। परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहा था। करीब दो महीने तक उन्हें टेंट में रहना पड़ा। इसके बाद क्वार्टर मिला। इतने वर्षों बाद भी परिवार को न सरकारी नौकरी मिली और न ही किसी कश्मीरी शरणार्थी संगठन से अपेक्षित सहायता।
कुछ ऐसा ही सरिता लांबा केसा थ हुआ। उनके पति गुलशन लांबा श्रीनगर के करण नगर में बेकरी चलाते थे। 19 मार्च 1990 को सामान खरीदने के बहाने आए आतंकियों ने दुकान में ही उनके पति पर हमला कर दिया। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां कथित तौर पर उन्हें जहर का इंजेक्शन देने के लिए कहा गया और बाद में उनकी मौत हो गई।
सरिता ने बताया कि मामले की सुनवाई के दौरान परिवार को धमकाया गया और अदालत में बयान बदलने के लिए दबाव बनाया गया। छोटे बच्चों और परिवार की सुरक्षा को देखते हुए उन्हें मजबूरी में उनकी बात माननी पड़ी। पति की बहन वीना इस सदमे को सहन नहीं कर पाईं और उनकी मृत्यु हो गई। परिवार के अन्य सदस्य अलग-अलग राज्यों में बस गए। गुलशन लांबा की दो अन्य बहनें कंचन और पप्पी भी सरकार से इंसाफ की गुहार लगा रही हैं।
पीड़ित परिवारों का कहना है कि उस समय तो हमें न्याय नहीं मिल लेकिन आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पंडितों की हुई हत्याओं की फाइलें दोबारा खोली जाएं। इन मामलों की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को सजा मिले। उनके लिए राखी आज भी उत्सव से ज्यादा उन रिश्तों की याद का दिन है, जिन्हें आतंकवाद ने उनसे छीन लिया।