बंगाल: दुर्गापूजा में इस बार रामराज से लेकर गंगा यात्रा तक के होंगे दर्शन, इस बार पंडालों में क्या खास?
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान अलग माहौल होता है। इस बार रामराज से लेकर गंगा यात्रा तक के दर्शन होंगे। इस बार पंडालों में क्या खास होगा? जानिए
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पश्चिम बंगाल की दुर्गापूजा में इस बार बहुत कुछ नया देखने को मिल रहा है। सरकार बदली है तो कुछ पूजा समितियों की थीम में बदले राजनीतिक-सामाजिक माहौल की झलक भी दिखाई दे रही है, हालांकि पूरे शरदोत्सव की तस्वीर इससे कहीं व्यापक है। कहीं रामराज के जरिये आदर्श समाज, शांति और सुशासन का संदेश है, कहीं गंगा की यात्रा को पंडाल की कहानी बनाया गया है और कहीं पद्म के जरिये भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता को सामने रखा गया है।
सत्ता परिवर्तन के बाद कुशासन से सुशासन की ओर
मध्य कोलकाता की तारा चंद दत्ता स्ट्रीट स्थित यंग बॉयज क्लब ने अपनी 57वीं दुर्गापूजा में रामराज को थीम बनाया है। पंडाल में भगवान राम और हनुमान की प्रतिमाओं के साथ शांति, गरिमा, न्याय और सद्भाव से जुड़े पोस्टर और चित्र होंगे। आयोजकों ने अपनी थीम को मई में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद कुशासन से सुशासन की ओर बदलाव के संदेश से जोड़ा है।
पूर्व मेदिनीपुर के कारीगर सूखे पत्तों, फूलों, से पंडाल तैयार कर रहे हैं। आयोजकों के मुताबिक उद्देश्य पंडाल की कलात्मकता के साथ न्याय, जिम्मेदारी, सद्भाव और करुणा का संदेश देना है।
इस बार पंडालों में क्या खास
- यंग बॉयज क्लब: ‘राम राज
- कुम्हारटोली पार्क: ‘गंगोत्री से गंगा’
- सुरुचि संघ, न्यू अलीपुर: ‘पद्म’
- कुम्हारटोली: पारंपरिक ‘शाबेकी’ प्रतिमाओं पर जोर
गंगा की यात्रा से पद्म तक
कोलकाता के कुम्हारटोली पार्क की इस साल की थीम गंगोत्री से गंगा है। हिमालय के गंगोत्री से निकलकर गंगा के समुद्र तक पहुंचने की यात्रा को पंडाल की कला और प्रस्तुति के जरिये दिखाया जा रहा है।
- नदी को भारतीय जीवन, संस्कृति और आस्था से जोड़ते हुए पूरी थीम तैयार की गई है। दक्षिण कोलकाता के न्यू अलीपुर स्थित सुरुचि संघ ने इस बार ‘पद्म’ को विषय बनाया है। कमल को भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह सुरुचि संघ की 74वीं पूजा है।
कुम्हारटोली में परंपरा पर जोर
पंडालों में नई थीम और प्रयोग जारी हैं, लेकिन प्रतिमाओं के मामले में पारंपरिक शाबेकी रूप पर जोर दिखाई दे रहा है। कुम्हारटोली के कारीगर बाबू पाल कहते हैं, भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर ज्यादा जोर है क्या, इस पर कहें तो बिल्कुल जोर तो है ही। बारिश और बढ़ती लागत ने कारीगरों की मुश्किल भी बढ़ाई है।