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वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा देने की मांग: सुप्रीम कोर्ट में 27 अक्तूबर को सुनवाई, क्या है मामला?
Fri, 23 Oct 2026 02:42 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 23 Oct 2026 02:42 PM IST
सार
वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर दर्जा देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 27 अक्तूबर को सुनवाई कर सकता है। याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित याचिका को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने की अपील की है, क्योंकि इसी तरह का मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। याचिका में स्कूलों में दोनों गीत-गाने या बजाने और उनके सम्मान के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई है। साथ ही, फिल्मों और पार्टियों में वंदे मातरम के इस्तेमाल के तरीके पर भी आपत्ति जताई गई है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
वंदे मातरम को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर दर्जा देने की मांग अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने की अपील की गई है। इस याचिका पर 27 अक्तूबर को सुनवाई हो सकती है। याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई है। उनकी ओर से अधिवक्ता अश्वनी दुबे ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट में क्यों लाना चाहते हैं याचिका?
याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी तरह की एक याचिका पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही याचिका को भी शीर्ष अदालत में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर सकती है। फिलहाल, याचिका में की गई मांगों पर अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है।
वंदे मातरम को लेकर क्या मांग की गई है?
जनहित याचिका में मांग की गई है कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर दर्जा और सम्मान दिया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वंदे मातरम ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, इसलिए इसे भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। याचिका में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के 1950 में दिए गए बयान का हवाला भी दिया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, जन गण मन में देश की राज्य व्यवस्था से जुड़े भाव व्यक्त होते हैं, जबकि वंदे मातरम देश के चरित्र और पहचान को दर्शाता है। इसी आधार पर दोनों को समान सम्मान देने की मांग की गई है।
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याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हर कार्यदिवस पर जन गण मन और वंदे मातरम गाए या बजाए जाएं। याचिका में कहा गया है कि दोनों गीतों के सम्मान और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार को राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि देश की एकता बनाए रखने और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए ऐसी नीति जरूरी है।
यह भी पढ़ें: बीफ खाने और जाति को लेकर ताने: 11वीं कक्षा के छात्र ने परेशान होकर की आत्महत्या, आरोपी अध्यापक गिरफ्तार
फिल्मों और पार्टियों में वंदे मातरम के इस्तेमाल पर क्या आपत्ति?
याचिका में दावा किया गया है कि वंदे मातरम के सम्मान को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश या नियम नहीं होने के कारण इसे कथित तौर पर ‘असभ्य तरीके’ से गाया जा रहा है और फिल्मों व पार्टियों में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इस गीत का नाटकीय प्रदर्शन न हो और इसे मनोरंजन से जुड़े विविध कार्यक्रमों में शामिल न किया जाए। उनका कहना है कि जब भी यह गीत गाया या बजाया जाए, वहां मौजूद लोगों को इसका उचित सम्मान करना चाहिए। हालांकि, ये याचिकाकर्ता के तर्क और मांगें हैं; इन पर अदालत का फैसला आना बाकी है।
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सुप्रीम कोर्ट में क्यों लाना चाहते हैं याचिका?
याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी तरह की एक याचिका पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही याचिका को भी शीर्ष अदालत में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर सकती है। फिलहाल, याचिका में की गई मांगों पर अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है।
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वंदे मातरम को लेकर क्या मांग की गई है?
जनहित याचिका में मांग की गई है कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर दर्जा और सम्मान दिया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वंदे मातरम ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, इसलिए इसे भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। याचिका में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के 1950 में दिए गए बयान का हवाला भी दिया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, जन गण मन में देश की राज्य व्यवस्था से जुड़े भाव व्यक्त होते हैं, जबकि वंदे मातरम देश के चरित्र और पहचान को दर्शाता है। इसी आधार पर दोनों को समान सम्मान देने की मांग की गई है।
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याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हर कार्यदिवस पर जन गण मन और वंदे मातरम गाए या बजाए जाएं। याचिका में कहा गया है कि दोनों गीतों के सम्मान और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार को राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि देश की एकता बनाए रखने और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए ऐसी नीति जरूरी है।
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फिल्मों और पार्टियों में वंदे मातरम के इस्तेमाल पर क्या आपत्ति?
याचिका में दावा किया गया है कि वंदे मातरम के सम्मान को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश या नियम नहीं होने के कारण इसे कथित तौर पर ‘असभ्य तरीके’ से गाया जा रहा है और फिल्मों व पार्टियों में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इस गीत का नाटकीय प्रदर्शन न हो और इसे मनोरंजन से जुड़े विविध कार्यक्रमों में शामिल न किया जाए। उनका कहना है कि जब भी यह गीत गाया या बजाया जाए, वहां मौजूद लोगों को इसका उचित सम्मान करना चाहिए। हालांकि, ये याचिकाकर्ता के तर्क और मांगें हैं; इन पर अदालत का फैसला आना बाकी है।